दुनियाभर में इंटरनेट बंद करने के मामले में मोदी का डिजिटल इंडिया सबसे आगे

इंटरनेट तक पहुंच मौलिक अधिकार फिर शटडाउन करना सरकारी विफलता

प्रधानमंत्री मोदी का दावा है कि उनकी सरकार में सभी तरह के आंकड़े और सेवाएं ऑनलाइन होने के कारण पारदर्शिता आई है। अगर यह सच है तो उनकी सरकार फिर इंटरनेट बंद करने में नंबर-वन क्यों है? 2018 और 2019 के दौरान दुनिया के 196 इंटरनेट शटडाउन में से 70 फ़ीसदी भारत में हुए। इसके बाद पाकिस्तान का नंबर आता है। लेकिन वो हमसे बहुत पीछे है। वहां इस अवधि में 12 बार इंटरनेट शटडाउन हुआ। जबकि हमारे यहां 134 बार इंटरनेट बंद किया गया। तो हम इस मामले में न केवल दुनिया में सबसे आगे हैं, बल्कि बाकी प्रतिस्पर्धी हमसे मीलों पीछे हैं।

इस साल भी हमारे देश में ही सबसे ज्यादा बार इंटरनेट शटडाउन हुआ। 104 बार। लेकिन इस संख्या से पूरी तस्वीर साफ नहीं होती। एक बार शटडाउन को सिर्फ एक ही माना जाता है। लेकिन कश्मीर में 143 से ज्यादा दिनों से इंटरनेट बंद है। यह अब भी जारी है। यह दुनिया का सबसे लंबा इंटरनेट शटडाउन है, जिससे सवा करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं।

असम समेत पूर्वोत्तर में भी यही स्थिति है। वहां हाल ही में दस दिन के लिए इंटरनेट शटडाउन हुआ। इस दौरान करीब पांच करोड़ लोग प्रभावित हुए। कश्मीर में अभी भी इंटरनेट बंद है। छात्रों को कॉलेज में दाखिला नहीं मिल रहा है। वहां के लोग देश के दूसरे हिस्सों के जैसे कई तरह के काम नहीं कर पा रहे हैं।

यह उन लोगों के लिए बेहद कठिन दिन हैं, जिनकी रोजी-रोटी इंटरनेट से चलती है। जैसे ओला और उबेर ड्राइवर, बढ़ई, इलेक्ट्रीशियन और दूसरे नौकरी-पेशा लोग जो अर्बनक्लैप, क्विकर और अन्य ऐप का इस्तेमाल करते हैं। यहां तक कि इलेक्ट्रिसिटी सर्विस, जहां प्रीपेड मीटर लगाए गए थे, इसमें भी इंटरनेट की जरूरत पड़ती है। अगर इंटरनेट बंद होता है तो बिजली बंद हो सकती है।

सच यह है कि अगर सरकार कानून-व्यवस्था के मद्देनज़र इंटरनेट शटडाउन को सही भी ठहराती है तो भी कश्मीर में जारी शटडाउन वहां के लोगों के लिए एक सामूहिक सज़ा की तरह है। सीआरपीसी की धारा 144 के मद्देनज़र इंटरनेट बंद किया जाता है। धारा 144, जो पांच या ज्यादा लोगों की भीड़ को इकट्ठा होने से रोकती है, उसके ज़रिये कैसे फोन और इंटरनेट सर्विस को बंद किया जा रहा है?

टेलीग्राफ एक्ट (1885) के तहत, सूचना-प्रसारण मंत्रालय के आदेश से धारा 144 फैलाव करते हुए इसमें इंटरनेट और टेलीफोन को शामिल किया गया है। ”टेंपरेरी सस्पेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विस (पब्लिक इमरजेंसी ऑर पब्लिक सेफ्टी) 2017”, के मुताबिक़ केंद्र या राज्य संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी, जिसके पास गृहमंत्रालय का प्रभार है, वो पुलिस में एसपी या उससे ऊंची रैंक वाले ऑफिसर को ऑर्डर भेजता है, जो लाइसेंस प्रदत्त कंपनियों को टेलीकॉम सर्विस बंद करने का निर्देश देता है। साधारण भाषा में धारा 144 के मुताबिक जो मजिस्ट्रेट इस अंग्रेज राज के कानून को लगाता है, वो टेलीग्राफ एक्ट के तहत एसपी को आदेश देकर इंटरनेट या फोन सर्विस बंद करवा सकता है। हस्ताक्षर समेत दूसरी प्राथमिकताएं इसे लागू करने के बाद होती हैं।

इससे पहले केरल हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा था कि इंटरनेट बढ़ती हुई जरूरत है, इसलिए यह एक मौलिक अधिकार है। उस केस में एक निश्चित समय के बाद कुछ छात्रों को हॉस्टल में मोबाइल उपयोग नहीं करने दिया जाता था। हाल ही में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि इंटरनेट शटडाउन करने के मामले में कानून-व्यवस्था एक अहम तथ्य है, लेकिन कोर्ट ने यह भी माना कि नागरिक इंटरनेट सर्विस पर निर्भर होते हैं और उनको निरस्त करने से जीवन प्रभावित होता है। कोर्ट ने इंटरनेट बैन को हटाने का आदेश दिया, क्योंकि कोर्ट को महसूस हुआ कि क्षेत्र में कानून-व्यवस्था सुधर चुकी है।

मोबाइल, टेलीफोन और इंटरनेट बैन से उपजने वाले गहरे कानूनी मुद्दों से कोर्ट बच निकला। वह भी ऐसे वक्त में जब सरकार दावा करती है कि वह भौतिक सेवाएं देने से दूर हो रही है और नगदी का लेन-देन भी कम करना चाहती है। अगर सरकार के दावे सही भी हैं और वो इंटरनेट से सेवाएं देना चाहती है तो शटडाउन की स्थिति में यह कैसे काम करेगा। क्योंकि हर तरह का भुगतान मोबाइल से करना होता है।

फिर इंटरनेट और मोबाइल सर्विस को बंदकर नागरिकों को सरकार और सभी सेवाओं से काट दिया जाता है। इसमें लेन-देन भी शामिल है। बहुत सारे लोग जो इंटरनेट सर्विस देकर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं, उनपर भी असर पड़ता है। शटडाउन के लिए कानून-व्यवस्था को आधार बनाए रखकर कोर्ट कुछ जरूरी सवालों से बच गया। जैसे क्या इंटरनेट बंद करना, कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के अनुपात में है या युक्तियुक्त प्रतिबंध क्या होंगे। हम पांच महीने तक चलने वाले इंटरनेट बंद को कैसे न्यायोचित ठहराएंगे। अगर किसी इलाके में कर्फ्यू भी लगता है तो उसे कुछ वक्त के लिए उठाया जाता है। कश्मीर में पूरी तरह बंद है। 143 दिनों से वहां मोबाइल इंटरनेट नहीं है।

टेलीग्राफ एक्ट की एक दूसरे उपनिवेशवादी कानून ”धारा 144” से तुलना हो सकती है। इस धारा के ज़रिये मजिस्ट्रेट को सभी तरह के प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार मिलता है। कोर्ट ने अपने फ़ैसलों में साफ किया है कि इस धारा के उपयोग के लिए कानून-व्यवस्था पर खतरा तुरंत आसन्न होना चाहिए। गौर करिए कि धारा 144 के लगने से एक नागरिक की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति, सभा करने और आने जाने के मौलिक अधिकार का हनन होता है। यह अधिकार हमें संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा दिए गए हैं। इसलिए इन पर लगने वाले प्रतिबंधों का युक्तियुक्त प्रतिबंधों की पात्रता से मिलान होना चाहिए। साथ ही यह प्रतिबंध सही अनुपात में हों।

कोई भी कदम जिससे हमारे मौलिक अधिकारों में कटौती होती है, उसको दो पैमानों पर खरा उतरना चाहिए। इनमें पहला है कि क्या यह कटौती, जो हमारे जुलूस निकालने, सभा करने औऱ दूसरे प्रदर्शनों के अधिकार पर पाबंदी लगाती है, वो युक्तियुक्त है। दूसरा, क्या यह कटौती कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी उपायों के अनुपात में है? क्या उत्तरप्रदेश के हर शहर, हर जिले के डीएम इन्हीं नतीजों पर पहुंचे?

आश्चर्यजनक है कि धारा 144 उनपर लागू नहीं हुई, जो सरकार के समर्थन में बाहर निकले। अलीगढ़, लखनऊ और दूसरे कस्बों-शहरों में संक्षिप्त और लंबे वक्त के लिए इंटरनेट बंद किया गया। साफ है कि सरकार लोगों के प्रदर्शन का जवाब में धारा 144 लगा रही है। बड़े स्तर पर FIR करवा रही है, प्रदर्शन के फोटोग्राफ और वीडियो से लोगों की पहचान करवाई जा रही है और एक बड़े समूह को सामूहिक सज़ा के तौर पर इंटरनेट बंद कर कई सेवाओं से वंचित कर रही है।

दूसरे शब्दों में, अगर प्रशासन को लगता है कि इंटरनेट कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है तो क्या जरूरत से ज्यादा लंबे वक्त के लिए इस पर बैन लगाया जा सकता है? क्या भारत सरकार को लगता है कि व्यक्तिगत बातचीत के सभी माध्यमों पर प्रतिबंध लगाकर ही कानून-व्यवस्था बनाए रखी जा सकती है? क्या यह कश्मीर और दूसरी जगह सरकारी नीतियों की असफलता की घोषणा नहीं है?

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