54 दिनों से जारी है होंडा के ठेका मज़दूरों का संघर्ष

क्षेत्र में ट्रेड यूनियनों के नेतृत्व को साझे संघर्ष को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी लेनी होगी

मानेसर (गुडगाँव)। काफी कठिनाइयों के वावजूद भी मानेसर होंडा के ठेका मज़दूरों का संघर्ष पिछले दो महीनों से जारी है। मंदी के बहाने अन्यायपूर्ण छंटनी के खिलाफ लगभग 2500 मज़दूरों आईएमटी मानेसर में धरना जारी रखा है। पिछले 4 नवम्बर 2019 को होंडा प्रबंधन ने अचानक 650 ठेका मज़दूरों का गेट बंद कर दिया था, जो पिछले 7-8 साल या उससे ज्यादा समय से कंपनी में काम कर रहे थे। 5 नवम्बर से ये मज़दूर कंपनी गेट के बाहर और बाकि ठेका मज़दूर कंपनी के अन्दर उत्पादन बंद करके धरने पर बैठ गए थे।

काफी मुश्किलों के वावजूद लगातार 15 दिन कंपनी के अन्दर बैठने के बाद 19 नवम्बर को प्रशासन और श्रम विभाग के आश्वासन पर सभी मज़दूर बाहर आये और कंपनी के बाहर धरना जारी रखा। लेकिन होंडा प्रबंधन के अड़ियल रबैयों के कारण आज तक कोई सम्मानजनक समझौता नहीं हो पाया। प्रबंधन ने समझौता वार्ता में भाग लेने से ही इनकार कर दिया। मज़दूर प्रतिनिधियों ने हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला से मिलने के वावजूद भी विवाद को हल करने के लिए कोई असरदार हस्तक्षेप नहीं दिखा।

22 नवम्बर को होंडा मज़दूरों ने मानेसर से गुड़गांव मिनी सचिवालय तक 17 किमी लम्बी रैली निकाली। इलाके की बाकि मज़दूर यूनियनें भी होंडा के संघर्षरत मज़दूरों के समर्थन में आयीं। 6 दिसम्बर को मानेसर में मज़दूर सभा का आयोजन हुआ। 17 दिसम्बर को गुड़गांव-मानेसर औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूरों ने होंडा मज़दूरों के समर्थन में खाना बहिष्कार किया। 21 दिसम्बर को रैली आयोजित कर गुड़गांव कमला नेहरु पार्क से गुड़गांव विधायक के पास मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया। मगर सरकार-प्रशासन-श्रम विभाग होंडा प्रबंधन के साथ खड़ा दिख रहा है।

होंडा प्रबंधन ने होंडा यूनियन के प्रधान सहित 6 मज़दूरों को इस आन्दोलन के चलते निलंबित कर दिया है। पिछले ढेड़ साल से यूनियन का माँग पत्र भी लंबित है।

एक तरफ होंडा प्रबंधन मंदी के बहाने मानेसर प्लांट में ठेका मज़दूरों की छंटनी कर रहा है, दूसरी तरफ होंडा के बाकि प्लांटों में उत्पादन शिफ्ट करके ओवरटाइम चला रहा है। ठेका मज़दूरों को वापस लेने की जगह होंडा प्रबंधन ने पिछले कुछ दिनों में करीब 800 नया नीम ट्रेनी भर्ती किया है। ऐसी स्थिति में, सिर्फ धरना जारी रखना ही नहीं बल्कि पूरे औद्योगिक क्षेत्र में ठेका-स्थायी मज़दूरों का और व्यापक और जबरदस्त संघर्ष ही होंडा जैसी कंपनी को झुका सकती है। इस बीच होंडा के बेंगलुरु प्लांट में भी यूनियन का पंजीकरण हो गया है। ऐसे में होंडा यूनियनों की आपसी तालमेल व एकजुट संघर्ष भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

मंदी के बहाने पूरे औद्योगिक क्षेत्र में लगातार छंटनी के माहौल में, यूनियनों पर लगातार हमले के माहौल में होंडा के ठेका मज़दूरों का संघर्ष एक उम्मीद की किरण पैदा किया है। एक जुझारू और व्यापक संघर्ष में इस आन्दोलन को तब्दील करके ही इस आन्दोलन को सफल बनाया जा सकता है। इस क्षेत्र में ट्रेड यूनियनों का नेतृत्व साझे संघर्ष को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी लें, यह समय की माँग है। 

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