नागरिकता कानून संशोधन का मूक शिकार 10 फीसद घुमन्तू जातियां, जो चर्चा से बाहर हैं!

सरकारी रिकार्ड में 840 घुमंतू जातियों का क्या होगा ? 

सरकारी रिकॉर्ड में हिंदुस्तान में ऐसी 840 जातियाँ हैं जबकि वास्तविक रूप में ऐसी जातियों की संख्या 1200 से ज्यादा है। मुश्किल से 20 फीसदी घुमन्तू जातियों के पास अपनी पहचान के दस्तावेज हैं, जबकि इन समाजों की जनसंख्या हमारी कुल जनसंख्या का 10 फीसदी है यानी 15 करोड़ के लगभग। सवाल ये है कि इन लोगों का क्या होगा? क्या इनको दोबारा से उसी घेटो (हिरासत शिविरों) में कैद कर देंगे जैसे 1871 में अंग्रेजों ने किया था?

इन जातियों का कोई एक मज़हब नहीं है। कालबेलिया समाज आधे तो हिन्दू धर्म के रीति-रिवाज़ मानता है जबकि आधे मुस्लिम धर्म के रीति-रिवाज़ मानता है। वे शिव की पूजा करते हैं जबकि अपने शादी विवाह में निकाह पढ़ते हैं। मरने पर व्यक्ति को दफनाते हैं जबकि हिंदुओं के तीज-त्यौहार मनाते है। इनको किस मजहब की दीवार में रखेंगे?

बहुरूपिया कला तो सबसे पाक-साफ़ कला मानी जाती है। ये सबसे ईमानदार कला है। वो बहुरूपिया जो आज शिव बना है वो कल ईमाम बनेगा और परसों पादरी। उसको किस धर्म के खांचे में बांटेंगे? बहुरूपिया अपने जीवन के अधिकांश पड़ाव हिन्दू धर्म के अनुसार तो कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव मुस्लिम धर्म के अनुसार पूरा करता है। उसे हम हिन्दू कहेंगे या मुस्लिम? जहां तक सवाल अपनी नागरिकता साबित करने का है तो शायद बहुरूपी कला तो हिंदुस्तान की सबसे पुरानी कला है। बहरूपिया ही राज परिवार की खुफ़िया एजेंसी हुआ करता था जिन्हें अय्यार बोला जाता था। इतिहास में इनकी पहचान इसलिये छुपाई गई क्योंकि इनका काम ख़ुफ़िया होता था।

ये लोग कभी साधु का भेस बनाकर तो कभी व्यापारी का रूप बनाकर अन्य राज्यों में जाते वहाँ की खुफ़िया जानकारी लाते, उनकी सेना की स्थिति, उसमे कितने तीरंदाज हैं, उनका असलाह कितना है (गोला-बारूद), प्रजा का राजा के प्रति रवैया और राज दरबार के विश्वासी व्यक्तियों की सूची। बहुरूपिया, अवाम की आवाज को नाटक के जरिये राजा तक पहुँचाता, वहां पर व्याप्त भ्रष्टाचार की जानकारी देता। इस तरह से ये पत्रकार की भूमिका निभाता ओर सुशासन की दिशा में योगदान देता। ये बहरूपिये ही थे जो रानी का श्रृंगार करते, उसके श्रृंगार के लिये विभिन्न फूल-पत्तियों को पीसकर सामग्री तैयार करते।

इन लोगों के पास अपनी पहचान के दस्तावेज तो दूर रहे, इन्हें कई राज्यों में तो बहुरूपिया जाति का दर्जा तक नहीं दिया गया है। हिंदुस्तान की पहचान “स्नेक चार्मर्स” की रही है और उसके पालक यही कालबेलिया ही थे। इनके पास अपने कोई दस्तावेज नहीं हैं, ये लोग कहाँ जायेंगे? गाड़िया-लुहार को किस कोटि में रखेंगे? उनमें आधे तो हिन्दू धर्म को मानने वाले हैं जबकि आधे मुस्लिम धर्म को मानने वाले, जबकि उनके पुश्तैनी काम लोहे के उपकरण तैयार करना रहा है। अकेले राजस्थान में इनकी जनसंख्या 5 लाख के करीब है।

ओड़ जाति ने मिट्टी को समतल करने का कार्य किया, नहरें बनाईं, इनके पास ख़ास नस्ल के ख़च्चर रहते हैं। राजस्थान के ओड़ हिन्दू धर्म को मानते हैं जबकि कुछ इस्लाम को। सवाल ये है कि इस कानून से किस ओड़ जाति को देश से बाहर निकालेंगे? क्योंकि पहचान के दस्तावेज न ओड़ हिन्दू के पास हैं और न मुस्लिम ओड़ के पास। ऐसे ही कलन्दर, बाजीगर, मदारी, कुचबन्दा, मिरासी, सांसी, गाड़िया-लुहार, छप्परबन्द, ढोली, सिकलीगर, कोली इत्यादि सैंकड़ों घुमन्तू जातियाँ किसी एक धर्म के अंतर्गत कभी नही रहीं, उनको हम किस चश्मे से देखेंगे?

हिंदुस्तान में आज यदि कोई हाशिये का समाज है तो वो घुमन्तू समाज है जिसके पास न कोई जमीन का पट्टा है, न कोई पहचान का दस्तावेज़, न किसी सरकारी स्कीम की कोई सुविधा मिलती है। इन समाजों के 94 फीसदी लोग तंबुओं में या कच्ची बस्ती मे रहते हैं। 68 फीसदी लोग भीख मांगते हैं। 80 फीसदी लोग पांचवीं कक्षा भी पास नहीं हैं। पहले तो इतिहास से इन समाजों को बेइज्जत करके बाहर निकाला गया, ब्रिटिश सरकार ने 1871 में जन्मजात अपराधी कानून के अंतर्गत इन समाजों को शामिल किया गया क्योंकि यही समाज राजाओं की सेना के सिपाही थे, यही समाज व्यापारी थे, यही समाज हथियार तैयार करते थे और यही समाज परिवहन का दायित्व संभालते थे।

इनकी स्थिति बिगड़ने के कई कारणों में एक बड़ा कारण राजपरिवारों की सत्ता समाप्त होना और उसके बाद सरकारों ने इन समाजों के लिए कोई ठोस काम नहीं किया। ये लोग हाशिये का जीवन जी रहे हैं जिनको न तो किसी सरकारी सुविधा का कोई लाभ मिलता है और न ही कला केंद्रों पर अपने फ़न को दिखाने का कोई अवसर। हमने इन समाजों को राजनीति का जोकर बना दिया है। हमने इन्हें जन्मजात अपराधी की कोटि से तो मुक्त किया किंतु उन्हें अभ्यस्त अपराधी की कोटि में रख दिया। उनके बिना जाने-समझे उनके गतिविधियों पर रोक लगा दी। कभी इनको अपराधी होने का तो कभी इनको बच्चा चोर होने का तमगा दे दिया ओर अब ये विदेशी नागरिक होने का खेल।

सरकारें भले ही किसी भी दल की हों, ये लोग न तो पहले कभी इनके बहीखाते का हिस्सा थे और न ही आज इनके बहीखाते का हिस्सा हैं। एक ओर तो केंद्र सरकार अपने बजट में घुमन्तू जातियों के लिये नीति आयोग में अलग से प्रावधान करने का आश्वाशन देती है, वहीं दूसरी तरफ उनको देश से बाहर निकालने पर तुली है। आखिर हम कैसा हिंदुस्तान बनाना चाहते हैं? क्या उस हिंदुस्तान में इन घुमन्तू समाजों के लिये भी कुछ होगा? क्या ये लोग इसको अपना हिंदुस्तान कह सकेंगे? क्या हम किसी भी रूप में इस कार्यवाही को सही ठहरा पायेंगे? क्या हम अपने सदियों के सीखे ज्ञान अपनी पुरखों की विरासत को एक कानून की बलि चढ़ा देंगे?

सभ्यता का एक पैमाना ये भी होता है कि उसमें अपने पुरखों की कितनी स्मृति शेष है? क्या इस आधार पर हम हिंदुस्तान को कहीं सभ्यता के अंत की ओर तो नहीं लेकर जा रहे हैं? सरकार के पास ऐसी कोई प्रक्रिया या तरीका नही है जो यह साबित कर पाये की अमुक घुमन्तू जाति बाहरी है या अमुक घुमन्तू जाति पुश्तैनी है। नागरिक संशोधन हमारी उस जुगलबन्दी को समाप्त कर देगा जो हमारी इन समाजों के साथ हुआ करती थी। यदि इसे रोका नहीं गया तो हमारी ये विरासत इसी कानून की बलि चढ़ जायेगी। हमारी आने वाली पीढियां हमसे ये सवाल पूछेंगी कि हमने अपने सदियों की उस विरासत को एक कानून की बलि चढ़ा दिया।

अश्वनी कबीर, मीडिया विजिल से साभार

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