व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक बेहद खतरनाक है

आधार कार्ड से इस निजता बिल तक निजी जिंदगी में दख़ल और पूरी आबादी पर नियंत्रण बनाने का खेल जारी

व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (पीडीपी) विधेयक, 2019 (निजता बिल) के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा; कथित अपराध की जांच करने या प्रॉसीक्यूशन; कानूनी कार्यवाही; व्यक्तिगत या घरेलू उद्देश्यों; पत्रकारिता के उद्देश्य आदि के बहाने निजी डाटा का इस्तेमाल हो सकता है।

मोदी-2 सरकार एक के बाद एक जनता के लिए घातक क़ानून बनाने में लगातार सक्रिय है। एक तरफ मज़दूर विरोधी चार श्रम संहिताएँ बनाने, सरकारी कंपनियों को मुनाफाखोरों को बेचने, जबरिया छंटनी आदि, तो दूसरी ओर कश्मीर, धारा-370, नागरिकता रजिस्टर, नागरिकता संशोधन क़ानून जैसे जन विरोधी क़ानूनों को पारित करने के साथ निजता पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक पेश कर दिया।

नागरिकता संशोधन बिल के शोर के बीच ही मोदी सरकार ने व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (पीडीपी) विधेयक, 2019 को 11 दिसंबर को लोकसभा में पेश किया। इससे पूर्व प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 दिसंबर, 2019 को इस निजता विधेयक को मंज़ूरी दी। इस बीच विपक्ष ने इसका जबर्दस्त विरोध किया। जबकि सरकार ने हठधर्मिता के साथ कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली सूचना प्रौद्योगिकी पर संसद की स्थायी समिति को दरकिनार करते हुए विधेयक संयुक्त प्रवर समिति के पास भेज दिया, जिसकी अध्यक्षता सत्तापक्ष का सदस्य करेगा।

क्यों जन विरोधी है निजता विधेयक

विधेयक में सरकार को फेसबुक और गूगल समेत तमाम विदेशी कंपनियों से गोपनीय निजी डेटा और गैर-निजी डेटा के बारे में पूछने का अधिकार दिया गया है। इसमें सरकारी एजेंसियों को क्रेडिट स्कोर, कर्ज वसूली और सुरक्षा से जुड़े मामलों में डेटा मालिक की सहमति के बिना भी उसकी डेटा प्रॉसेसिंग करने की छूट दिए जाने का प्रावधान है। सरकार को अधिकार होगा कि वह किसी भी सरकारी एजेंसी को प्रस्तावित कानून के प्रावधानों के दायरे से छूट दे सके।

  • यह विधेयक केंद्र सरकार को ये अधिकार देता है कि वह ‘देश की संप्रभुता और अखंडता के हित’ के नाम पर किसी सरकारी एजेंसी को निजता नियमों के दायरे से बाहर रख सकती है।
  • यह भारतीयों के डेटा को सुरक्षित रखने की बात के बहाने केंद्र सरकार को रियायत देकर नागरिकों की निगरानी करने की मंज़ूरी देता है।
  • यदि कोई व्यक्ति ‘स्वैच्छिक’ प्रमाणन नहीं कराता तो वह सरकारी एजेंसिओं का निशाना बनेगा।
  • सरकार किसी भी समय संप्रभुता या सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर निजी डेटा या सरकारी एजेंसी के डेटा का उपयोग कर सकती है।
  • इसमें गैर व्यक्तिगत डेटा की परिभाषा बहुत व्यापक है। यहाँ तक कि जाति, धर्म, चिकित्सकीय स्थिति, यौनिकता, पठन की आदत जैसी निजी जानकारी जुटाई जा सकती है।
  • यह नागरिक के निजता पर हमला और निजी ज़िन्दगी में दख़ल है, जो भारत के संविधान का भी उल्लंघन है।
  • इन आंकड़े से मतदाताओं को प्रभावित करने या धमकाने का काम किया जा सकता है।
  • सारी कवायदों के बावजूद इससे डेटा सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती है।

मसौदा तैयार करने वाले पैनल ने भी बताया ख़तरनाक

सन 2018 में इस विधेयक के पहले मसौदे को तैयार करने वाले पैनल के अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) बीएन श्रीकृष्ण ने इसे अति ‘खतरनाक’ बताया। जबकि अमेरिका-भारत व्यापार परिषद (यूएसआइबीसी) ने कहा कि मौजूदा स्वरूप में यह विधेयक भारतीय नागरिकों की निजता से समझौता करता है। इसमें नागरिकों की व्यक्तिगत सूचना तक पहुँच के मामले में सरकारी एजेंसियों को कुछ ज्यादा ही छूट दी गई है।

इन्सान पर नियंत्रण और बाजार का विस्तार

दरअसल, आधार कार्ड के जरिए देश के नागरिकों के निजी आंकडे जुटाने के साथ मोदी सरकार अब निजता विधेयक लाकर जनता की निजी जिंदगी में दख़ल और बढ़ाने के साथ देश की पूरी आबादी को अपने नियंत्रण में लेने के दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है। इसकी शुरुआत व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2018 से ही हुई थी, लेकिन चुनावी मौसम आने से यह स्थगित हो गई थी।

यहाँ यह भी गौरतलब है कि आज पूरी दुनिया में जनता के निजी ज़िन्दगी तक के आंकड़े जुटाने का कारोबार व्यापक रूप ले चुका है। इन्सान पर नियंत्रण और बाजार का विस्तार इसके केंद्र में है। एप्पल, गूगल, फेसबुक, ट्विटर एवं वाट्सएप जैसी कंपनियां से लेकर रिलायंस जिओ तक इस खेल की आज बादशाह हैं और व्यापार के माध्यम से बड़े पैमाने पर लाभ कमा रही हैं।

मोदी सरकार का डेटा संरक्षण का यह निजता बिल उसी मुहीम का अहम हिस्सा है, जिसकी मुखालफ़त ज़रूरी है।

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