“मज़दूरों पर बढ़ते हमलों के खिलाफ एक जुट और एक मुठ होना होगा!”

मज़दूरों के हालात और संघर्ष की स्थितिओं पर यूनियन नेताओं की सोच-3

आज के दौर में, मज़दूर वर्ग पर हमले तेजी से बढ़ रहे हैं, श्रम क़ानूनी अधिकार छिन रहे हैं, छँटनी-बन्दी तेज हो गई है और मज़दूर धर्म-राष्ट्र जैसे गैर मुद्दों पर भ्रमित हैं, तब मज़दूर आन्दोलन की समस्याओं पर यूनियन नेता क्या सोच रहे हैं? ‘मेहनतकश’ टीम द्वारा कुछ यूनियन प्रतिनिधियों से जानी गई राय के क्रम में श्रमिक नेता चन्द्र मोहन लखेड़ा की राय प्रस्तुत है।

1- श्रम कानून बदल रहे हैं, इसे आप कैसे देखते हैं?

-श्रम कानून का बदलना सीधे-सीधे मज़दूरों का शोषण करना है। इससे पहले से ही शोषण और दमन की नीति से कार्य करवा रहे मालिकों को ही फायदा होगा। समाज में मज़दूर अपनी बात को कभी भी नही रख पायेगा। अपने अधिकारों के लिए पहले कानून व्यवस्था के चलते थोडा बहुत लड़ भी लेता था, पर जब बचे खुचे नियम ही ख़त्म हो जायेंगे तो फिर कैसे अपने उज्जवल भविष्य के लिए अपनी आवाज उठा सकेगा?

2- रोजगार के नए रूपों फिक्सड टर्म व नीम ट्रेनी से आपके प्लांट में क्या फर्क़ पड़ रहा है?

-मैं जिस प्लांट में कायर्रत हूँ वँहा पर अभी फिक्सड टर्म व नीम ट्रेनी स्किम लागू नही हुई है, परन्तु मोदी सरकार जैसे श्रम कानूनों को बदल रही है और जो ये फिक्सड टर्म, नीम ट्रेनी जैसी व्यवस्था ला रहे हैं इससे सीधे लग रहा है की हम पुनः गुलामी की जंजीरो में जकड़ने वाले हैं। ये रोजगार के नए श्रोत नही अपितु दीमक के घुन की तरह हमे धीरे-धीरे ख़त्म करने की पूरी कोशिश है।

3- क्या इस दौर में छाँटनी व तालाबंदी बढ़ रही है?

-निसन्देह आज छँटनी और तालाबन्दी अत्यधिक मात्रा में बढ़ गई है, जिसका मूल कारण मालिको द्वारा सरकार के साथ मिलकर करोड़ो की सब्सिड़ी डकारना, मिली छुट से अपना भला कर भाग जाना इत्यादि है।

4- आज मज़दूरों को संगठित होने की प्रमुख चुनौतियाँ क्या है?

-आज मज़दूर संगठित नही हो पा रहे हैं जिसका मूल कारण हम मज़दूर वर्ग में एकता नही है। फिर अगर थोड़ी एकता भी है तो निजी स्वार्थ के कारण हम संगठित नही हो पा रहे हैं। ये हम मज़दूर वर्ग में सबसे बड़ी कमजोरी है कि जब मेरा सही चल रहा है मैं क्यूं दूसरे की सहायता करूं। ऊपर से जातिवाद-क्षेत्रवाद जैसे बंटवारे भी बड़ी समस्या हैं। ऐसी धारणा का त्याग करना होगा और समाज के हर मज़दूर वर्ग की लड़ाई एकताबद्ध संगठन से लड़नी होगी।

5- आपको ठेका व स्थाई श्रमिकों को एक साथ संगठित करने की समस्या क्या लगती है?

-ठेका व स्थाई श्रमिकों को एक साथ संगठित करने की समस्या का जबाब पीछे हम दे चुके हैं। हमें अपने निजी स्वार्थ से बाहर निकलकर पूरे मज़दूरवर्ग के हित को देखना होगा। ठेका-स्थाई की मजबूत एकता बनाकर सारे मज़दूरों को संगठित करने के लिए यह जरूरी है।

6- आज मज़दूरों को क्या प्रभावित कर रहा है- पाकिस्तान, राष्ट्रवाद, गोरक्षा जैसे मुद्दे या श्रमिक अधिकारों पर बढ़ते हमले, छाँटनी-तालाबंदी जैसी समस्या?

-आज मज़दूरों को सबसे ज्यादा प्रभावित अगर कोई चीज कर रहा है तो वह है एकता का नही बन पाना। सभी मज़दूर चाहे वह स्थाई हो चाहे ठेकेदार का हो, चाहें असंगठित क्षेत्र का मज़दूर हो, हम एक नही हो पा रहे हैं। कोई राष्ट् के नाम पर बट गया कोई क्षेत्रवाद के नाम पर, कोई निजी स्वार्थ के नाम पर। कश्मीर, पाकिस्तान, मन्दिर-मस्जिद, गोरक्षा आदि हमारी ज़िदगी से जुड़ी मूल समस्याओं से भटकाने और हमारी एकता को तोड़ने का काम कर रहे हैं। समाज में जहर घोल रहे हैं। समाज से इन कुरीतियों को कैसे समाप्त करना है इसपर और ज्यादा सोचना होगा। असल में मज़दूरों पर बढ़ रहे हमले छँटनी तालाबन्दी और बदलते श्रम कानून ही मज़दूरों की मूल समस्या है।

7- यूनियनों को आज के समय की चुनौतियों को किस प्रकार हल करना चाहिए?

-आज जब यूनियन के अधिकार को ही छीना जा रहा है, तब यूनियनों की चुनौतियाँ और ज्यादा बढ़ गयी हैं। पूरे देश में मज़दूर आन्दोलन बिखरा हुआ है। मज़दूरों पर इतने बड़े हमले हो रहे हैं लेकिन कोई बड़ा आन्दोलन नहीं बन पा रहा है। महासंघों द्वारा साल में एक-दो दिन की हड़ताल से कुछ होने वाला नहीं है। हमे समाज में प्रत्येक वर्ग के ऊपर हो रहे हमलों, दमन और शोषण के खि़लाफ एक आवाज उठाने के लिए एकजुट और एकमुठ हो कर आगे आना होगा। लगातार हमलों के खि़लाफ लगातार आन्दोलन बढ़ाना होगा। इसके लिए निजी स्वार्थ की भावनाआें का त्याग करना होगा, समाज में मज़दूर भाई चारा बढ़ाना होगा।

चन्द्र मोहन लखेड़ा
महामंत्री, नेस्ले कर्मचारी संगठन, पंतनगर

‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका, नवम्बर-दिसम्बर, 2019 में प्रकाशित

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