सप्ताह की कविता : बल्ली सिंह चीमा की गजलें एवं गीत

फ़ोटो : 15 दिसम्बर को जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस की बर्बरता

रोटी माँग रहे लोगों से / बल्ली सिंह चीमा

रोटी माँग रहे लोगों से, किसको ख़तरा होता है ।
यार, सुना है लाठी-चारज, हलका-हलका होता है ।

सिर फोड़ें या टाँगें तोड़ें, ये कानून के रखवाले,
देख रहे हैं दर्द कहाँ पर, किसको कितना होता है ।

बातों-बातों में हम लोगों को वो दबा कुछ देते हैं,
दिल्ली जा कर देख लो कोई रोज़ तमाशा होता है ।

हम समझे थे इस दुनिया में दौलत बहरी होती है,
हमको ये मालूम न था कानून भी बहरा होता है ।

कड़वे शब्दों की हथियारों से होती है मार बुरी,
सीधे दिल पर लग जाए तो ज़ख़्म भी गहरा होता है ।


हर तरफ़ काला कानून दिखाई देगा / बल्ली सिंह चीमा

हर तरफ़ काला कानून दिखाई देगा ।
 तुम भले हो कि बुरे, कौन सफ़ाई देगा ।

 सैकड़ों लोग मरे, क़ातिल मसीहा है बना,
 कल को सड़कों पर बहा ख़ून गवाही देगा ।

वो तुम्हारी न कोई बात सुनेंगे, लोगो !
 शोर संसद का तुम्हें रोज़ सुनाई देगा ।
 
 इस व्यवस्था के ख़तरनाक मशीनी पुर्ज़े
 जिसको रौंदेंगे, वही शख़्स सुनाई देगा ।
 
 अब ये थाने ही अदालत भी बनेंगे ’बल्ली’
 कौन दोषी है, ये जजमेंट सिपाही देगा ।


ये किसको ख़बर थी कि ये बात होगी / बल्ली सिंह चीमा

ये किसको ख़बर थी कि ये बात होगी
पकी खेतियों पर भी बरसात होगी

ये सूखे हुए खेत कहते हैं मुझसे
सुना था कि सावन में बरसात होगी

ये सावन भी जब सावनों-सा नहीं है
तो फिर कैसे कह दूँ कि बरसात होगी

उमड़ते हुए बादलो! ये बताओ
कि रिमझिम की भाषा में कब बात होगी

उसूलों को जीवन में शामिल भी रखना
कभी बेअसूलों से फिर बात होगी

अँधेरे हो तुम तो उजाले हैं हम भी
कभी न कभी तो मुलाक़ात होगी


हिलाओ पूँछ तो करता है प्यार अमरीका / बल्ली सिंह चीमा

हिलाओ पूँछ तो करता है प्यार अमरीका।
झुकाओ सिर को तो देगा उधार अमरीका।
बड़ी हसीन हो बाज़ारियत को अपनाओ,
तुम्हारे हुस्न को देगा निखार अमरीका।

बराबरी की या रोटी की बात मत करना,
समाजवाद से खाता है ख़ार अमरीका।
आतंकवाद बताता है जनसंघर्षों को,
मुशर्रफ़ों से तो करता है प्यार अमरीका।

ये लोकतंत्र बहाली तो इक तमाशा है,
बना हुआ है हक़ीक़त में ज़ार अमरीका।
विरोधियों को तो लेता है आड़े हाथों वह,
पर मिट्ठूओं पे करे जाँ निसार अमरीका।

प्रचण्ड क्रान्ति का योद्धा या उग्रवादी है,
सच्चाई क्या है करेगा विचार अमरीका।
तेरे वुजूद से दुनिया को बहुत ख़तरा है,
यह बात बोल के करता है वार अमरीका।

स्वाभिमान गँवाकर उदार हाथों से,
जो एक माँगो तो देता है चार अमरीका।
हरेक देश को निर्देश रोज़ देता है,
ख़ुदा कहो या कहो थानेदार अमरीका।


तय करो किस ओर हो तुम / बल्ली सिंह चीमा

तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।
आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो ।।

ख़ुद को पसीने में भिगोना ही नहीं है ज़िन्दगी,
रेंग कर मर-मर कर जीना ही नहीं है ज़िन्दगी,
कुछ करो कि ज़िन्दगी की डोर न कमज़ोर हो ।
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।।

खोलो आँखें फँस न जाना तुम सुनहरे जाल में,
भेड़िए भी घूमते हैं आदमी की खाल में,
ज़िन्दगी का गीत हो या मौत का कोई शोर हो ।
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।।

सूट और लंगोटियों के बीच युद्ध होगा ज़रूर,
झोपड़ों और कोठियों के बीच युद्ध होगा ज़रूर,
इससे पहले युद्ध शुरू हो, तय करो किस ओर हो ।
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।।

तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।
आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो ।।


ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के / बल्ली सिंह चीमा

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के ।
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के ।

कह रही है झोपडी औ’ पूछते हैं खेत भी,
कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के ।

बिन लड़े कुछ भी यहाँ मिलता नहीं ये जानकर,
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।

कफ़न बाँधे हैं सिरों पर हाथ में तलवार है,
ढूँढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गाँव के ।

हर रुकावट चीख़ती है ठोकरों की मार से,
बेडि़याँ खनका रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।

दे रहे हैं देख लो अब वो सदा-ए-इंक़लाब,
हाथ में परचम लिए हैं लोग मेरे गाँव के ।

एकता से बल मिला है झोपड़ी की साँस को,
आँधियों से लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।

तेलंगाना जी उठेगा देश के हर गाँव में,
अब गुरिल्ले ही बनेंगे लोग मेरे गाँव में ।

देख ‘बल्ली’ जो सुबह फीकी दिखे है आजकल,
लाल रंग उसमें भरेंगे लोग मेरे गाँव के ।



कवि : बल्ली सिंह चीमा

जन्म : २ सितम्बर, १९५२ को चीमाखुर्द गाँव, अमृतसर ज़िला, पंजाब में।

शिक्षा : स्नातक के समकक्ष प्रभाकर की डिग्री ‘गुरु नानक विश्वविद्यालय’, अमृतसर से

कार्यक्षेत्र : चाहे उत्तराखंड आंदोलन रहा हो या फिर राज्य बनने से पूर्व शराब विरोधी आंदोलन, सभी में बल्ली सिंह अपनी कविताओं के साथ जनता के मध्य उपस्थित रहे। बल्ली सिंह चीमा अपनी जमीन से जुड़े हुए जनकवि हैं। कृषि एवं स्वतंत्र पत्रकारिता दोनों को ही इन्होंने समान रूप से अपनाया है।


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