“देश हित के बहाने मज़दूरों से धोखा”

मज़दूरों के हालात और संघर्ष की स्थितिओं पर यूनियन नेताओं की सोच-2

एक तरफ मज़दूर विरोधी श्रम संहिताएँ आ रही हैं, सरकारी कंपनियां बिक रही हैं, छंटनी-बंदी बढ़ रही है; तो दूसरी तरफ पूरे मुल्क को साम्प्रदायिक बंटवारे में उलझा दिया गया है। ऐसे कठिन दौर में मज़दूर आन्दोल की समस्याओं पर यूनियन नेता क्या सोच रहे हैं? ‘मेहनतकश’ टीम द्वारा कुछ यूनियन प्रतिनिधियों से उनकी राय जानी गई। ‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका में प्रकाशित साक्षात्कार को हम यहाँ क्रमशः प्रस्तुत कर रहे हैं। इस कड़ी में डाईकिन के श्रमिक नेता दौलत राम के विचार. . .

1- श्रम कानून बदल रहे हैं, इसे आप कैसे देखते हैं?

-श्रम कानूनों में जो बदलाव हुआ है उससे साफ है कि सरकार मज़दूरों के लिए कुछ नहीं सोचती, वह मज़दूरों के खि़लाफ है। इस तरह मज़दूरों का भविष्य अंधकारमय है। खासकर ठेका मज़दूरों पर हमला किया गया है, रोजगार के नए रूप के नाम पर धोखा है। ये कैसा देशहित है?

2- रोजगार के नए रूपों फिक्सड टर्म व नीम ट्रेनी से आपके प्लांट में क्या फर्क़ पड़ रहा है?

-सरकार नीम ट्रेनी और फिक्स्ड टर्म नौकरी की जो नई कैटेगरी लेकर आयी है उससे स्थायीकरण की प्रक्रिया ख़त्म हो गई है। प्लांट के अंदर भी फिक्स्ड टर्म काॅन्ट्रैक्ट को लागू किया गया है, जिनकी बार बार ट्रेनिंग के नाम पर काॅन्ट्रैक्ट बढ़ाया जाता है। पाँच-पाँच साल तक नौकरी स्थाई नहीं की जाती। इससे बेरोजगारी बढ़ने के अलावा और कुछ नहीं हुआ है। हमारे दूसरे प्लांट में स्किल डेवलपमेंट के नाम पर अलग-अलग जगह से भर्ती होती है।

3- क्या इस दौर में छाँटनी व तालाबंदी बढ़ रही है?

-इस दौर में छंटनी व तालाबंदी बढ़ रही है। एक तरफ तो कंपनियां ट्रेनिंग के नाम भर्ती करती हैं वहीं दूसरी तरफ एक झटके में नौकरी से निकाल देती हैं। एक तरफ लोग नौकरी के लिए लाइन में लगे हैं वहीं दूसरी तरफ छँटनी हो रही है। जो ठेके पर हैं उनका स्थाईकरण होना था तो उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यहाँ इंडियन और जापानी जोन में टीएस टेक प्लांट में, गुड़गांव और मानेसर में कई कंपनियों में छँटनी हुई है और ताला लगा है जैसे ओमेक्स, एंड्डुरेंस, हीरो में। इससे बेरोजगारी बढ़ी है।

4- आज मज़दूरों को संगठित होने की प्रमुख चुनौतियाँ क्या है?

मज़दूरों के संगठित होने की कई समस्याएं हैं। आज बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि लोग समझने को तैयार नहीं हैं। संगठित होने को तैयार नहीं हैं। जो नए मज़दूर बाहर से काम करने आते हैं उनको इस (निमराना) बेल्ट के बारे में कुछ पता नहीं होता कि पूँजीपतियों का और सरकार का रवैया क्या है? कानून या श्रम कानून क्या है? किस चीज की लड़ाई है? इसलिए उनका जुड़ाव नहीं बन पा रहा है। पूँजीपतियों और सरकार के गठजोड़ का बहुत दबाव है मज़दूरों पर।

5- आपको ठेका व स्थाई श्रमिकों को एक साथ संगठित करने की समस्या क्या लगती है?

-ठेका व स्थाई श्रमिकों को एक साथ संगठित करने की समस्या गहरी है। ठेका श्रमिकों का वेतन इतना कम है कि वे ज्यादा दिन तक एक जगह काम नहीं कर पाते। स्थाई और ठेका श्रमिकों की माँगें अलग अलग हैं, बहुत दूर तक साथ नहीं चल पाते हैं। ठेका श्रमिक को लगता है स्थाई श्रमिक अपने वेतन की लड़ाई लड़ेंगे क्योंकि उनकी नौकरी सुरक्षित है।

6- आज मज़दूरों को क्या प्रभावित कर रहा है- पाकिस्तान, राष्ट्रवाद, गोरक्षा जैसे मुद्दे या श्रमिक अधिकारों पर बढ़ते हमले, छाँटनी-तालाबंदी जैसी समस्या?

-अभी सरकार द्वारा एकतरफ तो श्रम कानूनों में श्रमिक विरोधी संशोधन किया गया वहीं दूसरी तरफ कश्मीर में धारा 370 हटाकर सभी का ध्यान भटका दिया गया। सरकार मूल मुद्दे से मज़दूरों का और लोगों का ध्यान भटका रही है ताकि कोई आंदोलन खड़ा ना हो, कोई विरोध ना हो। ऐसे में हम मज़दूर भ्रमित हैं।

7- यूनियनों को आज के समय की चुनौतियों को किस प्रकार हल करना चाहिए?

-आज की स्थिति में संगठित होकर काम करना पड़ेगा। जिस प्रकार से श्रम कानूनों में संशोधन हुए हैं, उससे लगता है यूनियन का अधिकार ख़त्म होने वाला है। इसलिए सभी संगठनों और ट्रेड यूनियनों को एक साथ होकर लड़ना होगा। प्लांट स्तर की लड़ाई से काम नहीं चलने वाला है।

दौलत राम
महासचिव, डाईकिन एयर कंडीशनिंग मज़दूर यूनियन, निमराना, राजस्थान

‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका, नवम्बर-दिसम्बर, 2019 में प्रकाशित

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