ग्रामीण इलाकों में निचले स्तर पर गिरी मज़दूरी !

लेबर ब्यूरो द्वारा संकलित क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार 25 व्यवसायों (12 कृषि और 13 गैर-कृषि) में सितंबर के दौरान ग्रामीण भारत में पुरुष श्रमिकों के लिए दैनिक वेतन दर 331.29 रुपये थी। यह 2018 के सितंबर के आंकड़ों के मुक़ाबले 3.42% अधिक था।

सितंबर में वास्तविक ग्रामीण मजदूरी वृद्धि माइनस 3.8% तक गिर गई है। यह भारत में गहरी संरचनात्मक मंदी की पुष्टि करती है, इसका सबूत एफ़एमसीजी और दोपहिया वाहनों की बिक्री में आई सुस्ती है। लेबर ब्यूरो द्वारा संकलित क्षेत्र के आंकड़ों के अनुसार 25 व्यवसायों (12 कृषि और 13 गैर-कृषि) में सितंबर के दौरान ग्रामीण भारत में पुरुष श्रमिकों के लिए दैनिक वेतन दर 331.29 रुपये थी। यह 2018 के सितंबर के आंकड़ों के मुक़ाबले 3.42% अधिक था।

जनवरी 2019 के बाद “नाममात्र” और “वास्तविक” वृद्धि के बीच का विचलन विशेष रूप से देखा जा सकता है। दिसंबर 2018 के बीच सितंबर 2019 में, ग्रामीण मजदूरी में नाममात्र वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि फ्लैट रही है, इसमें 3.76% से 3.42% तक मामूली गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, इसी अवधि के दौरान ग्रामीण मजदूरों के लिए सीपीआई मुद्रास्फीति 1.66% से 7.20% हो गई है।

सीधे शब्दों में कहें, तो ग्रामीण मजदूरों ने हाल के महीनों में (मार्च से) जो भी थोड़ा वृद्धि हासिल की वह महंगाई खा गई। ये यह बताता है कि दोपहिया वाहनों की बिक्री को ग्रामीण मांग का बैरोमीटर क्यों माना जाता है। बाजार अनुसंधान फर्म नीलसन ने भारत में ग्रामीण एफएमसीजी खपत का अनुमान लगाया है कि जुलाई-सितंबर में सालाना 5% की वृद्धि हुई है, जो पिछले सात वर्षों में सबसे कम है।

चालू वित्त वर्ष के दौरान वास्तविक ग्रामीण वेतन वृद्धि नकारात्मक क्षेत्र में कम होने के दो कारण हो सकते है –

पहला ढांचागत है: कम फसल की कीमतें, विशेष रूप से नोटबंदी के बाद से। अर्थव्यवस्था के समग्र रूप से धीमा होने से खेतों में श्रम के साथ-साथ गैर-कृषि रास्ते जैसे निर्माण, विनिर्माण और मिश्रित सेवाओं की मांग कम हो गई है।

दूसरा: इस बार खरीफ की फसल का उत्पादन शुरुआत में सूखे, फिर बारिश देर और कटाई के वक़्त लंबे समय तक बेमौसम बारिश से प्रभावित हुआ है। साथ में, उन्होंने कृषि श्रम मांग को प्रभावित किया है, यहां तक कि अर्थव्यवस्था के बाकी हिस्सों में रोजगार के अवसरों में भी कमी आई है।

साभार : जनसत्ता

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