टेलीकॉम सेक्टर: लाइसेंस-परमिट राज से लाइसेंस की लूट राज तक की गाथा

पढिए, कैसे प्राइवेट कंपनियों ने सरकार को चूना लगया

सरकारी कंपनियों के साथ दूरसंचार क्षेत्र की प्रमुख निजी कंपनियां वर्तमान में रिलायंस जियो के साथ तीन साल से क़ीमतों की लड़ाई से जूझ रही है। इससे उनकी आमदनी पर भारी असर पड़ा है। जियो ने बहुत कम कॉल और डेटा शुल्क के साथ बाज़ार में अपनी उपस्थिति दर्ज की है। इसे अन्य कंपनियों ने दूसरों का हक मारने वाला मूल्य निर्धारण बताया है। निजी कंपनियों के मामले में अपने राजस्व के प्रतिशत के रुप में अपने लाइसेंस शुल्क के भुगतान के दायित्वों का और सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश का सम्मान न करके यह जटिल हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इन प्राइवेट ऑपरेटर्स को लाइसेंस फीस के रूप में 92,000 करोड़ रुपये भुगतान करने का आदेश दिया है। इससे इन कंपनियों के लिए संकट पैदा हो गया है। यह स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क 41,000 करोड़ रुपये के अलावा है जो उनके संकट को और बढ़ा रहा है।

इससे टेलीकॉम क्षेत्र की निजी कंपनियों की परेशानी और बढ़ गई जो इस बड़ी राशि का भुगतान करने के लिए मजबूर है जबकि ये कंपनियां खुद भारी वित्तीय संकट से गुज़र रही हैं। वे जो उल्लेख करना भूल जाते हैं, वह मामूली राशि था, जिसको लेकर शुरुआत में विवाद खड़ा हुआ। मूल राशि केवल 23,000 करोड़ रुपये थी और 92,000 करोड़ रुपये की शेष राशि न चुकाए हुए राशि पर जुर्माने और ब्याज शुल्क हैं।

ये 23,000 करोड़ रुपये हर साल लाइसेंस फीस के रूप में अपने राजस्व का एक छोटा सा हिस्सा नहीं चुका पाने से गुजरते वर्षों में इकट्ठा हो गए। ये टेलीकॉम कंपनियां चालाकी भरी लेखांकन प्रक्रिया का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही थी, जिससे दूरसंचार विभाग (डीओटी) सहमत नहीं था , जिससे विवाद बढ़ गया।

इस मुद्दे को जल्दी से हल करने के बजाय ये निजी कंपनियां पहले टेलीकॉम डिस्प्यूट सेटलमेंट ट्रिब्यूनल गईं, फिर उच्च न्यायालयों का दरवाज़ा खटखटाया और आख़िर में सुप्रीम कोर्ट पहुंची। यह सब समायोजित सकल राजस्व या एजीआर को लेकर है, जिसमें से उन्हें एक मामूली राशि देना था।

एक लेखांकन दृष्टिकोण से देखा जाए तो इन दूरसंचार कंपनियों ने और बुरा किया। उन्होंने इन विवादित राशियों के लिए अपनी बैलेंस शीट में कोई प्रावधान नहीं किया जिसका मतलब है कि उन्होंने जानबूझकर अपने लाभ में न चुकाए गए राशि (या विवादित राशि) को शामिल किया ताकि जब वे शेयर बाजार में शेयर लाते हैं तो वे बहुत अधिक आकर्षक लगें। इसलिए उनकी आकर्षक सफलता की कहानी का एक बड़ा हिस्सा जानबूझकर इन दायित्वों को अपने शेयरधारकों से छिपा और लाइसेंस शुल्क के वास्ते वैध बकाया राशि को रोक कर तैयार किया गया था।

निस्संदेह जैसा कि यह हमेशा होता है, जब निजी कंपनियों को परेशानी होती है तो ऐसे में जनता ने ही उनकी परेशानी को दूर किया है। पूंजीगत वस्तुओं के लिए अधिक चालान प्रक्रिया (ओवर-इनवॉइसिंग) के माध्यम से निजी कंपनियों द्वारा अक्सर ये राशि ग़ैर क़ानूनी तरीके से निकाल ली जाती है और इस अंतर को टैक्स हेवेन देशों में स्थानांतरित कर दिया जाता है; अन्य कंपनियों के “संस्थापकों” से सेवाएं ली जाती हैं; और “चतुर” लेखांकन प्रथाओं की कई किस्म होती है। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है तो नुकसान उठाने वालों में बैंक और सामान्य शेयरधारक होते हैं। और निश्चित रूप से एयरटेल और आइडिया-वोडाफोन दोनों निजी कंपनियों के ग्राहकों की सेवाएं भी कम हो रही हैं।

इन आंकड़ों को परिप्रेक्ष्य में रखने पर इसकी व्यापक रूप से चर्चा की जा रही है कि बैंकों से दूरसंचार क्षेत्र के ऋण 7 लाख करोड़ रुपये के हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों या एनपीए में बदल जाएगा जब सरकार वित्तीय समस्या से निकलने के लिए टेलीकॉम कंपनियों को सहायता नहीं देती है। इसलिए सरकार द्वारा इन कंपनियों को परेशानियों से निकलने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है।

ऐसा नहीं है कि इस दूरसंचार संकट में लाभ कमाने वाली कोई कंपनी नहीं है।भले ही यह काफी हद तक आत्म-प्रेरित है। रिलायंस जियो ने देर से टेलीकॉम कारोबार में प्रवेश किया और इसे तकनीक का फायदा हुआ। यह भविष्य के प्राथमिक दूरसंचार व्यवसाय के रूप में सीधे डेटा की ओर रुख किया जो वॉयस के साथ-साथ मैसेज को भी ग्रहण करता जो कि स्पष्ट रूप से विरासती काम है। आज हम वॉयस और मैसेज को मोबाइल डेटा के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं, जबकि इसके उलट – मोबाइल डेटा के लिए वॉयस सेवाओं का उपयोग – बहुत कम सफल है।

दूसरा, जियो के पास अपने पेट्रोलियम और गैस कारोबार से भारी मुनाफा और जमा पूंजी है। यह वह पूंजी है जिसका इस्तेमाल इसने दूरसंचार में अपने शुरुआती प्रतिस्पर्धा के लिए किया है। नतीजतन, उच्चतम न्यायालय के फैसले के चलते इन टेलीकॉम कंपनियों को जो बकाया राशि का भुगतान करना पड़ता वह औसतन 13 करोड़ रुपये है, जबकि एयरटेल को लगभग 22,000 करोड़ रुपये और वोडाफोन को लगभग 20,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना है। और इसका बहुत कम ऋण है क्योंकि बुनियादी ढांचे को बड़े पैमाने पर अन्य रिलायंस कंपनियों द्वारा तैयार किया गया या स्थानांतरित किया गया है।

टेलीकॉम क्षेत्र की ये कुव्यवस्था लंबे समय से होती रही है। पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान राजस्व-हिस्सेदारी की योजना (रेवेन्यू-शेयरिंग) मौजूदा गड़बड़ी का कारण बनी। बहुमत खोने के बाद वर्ष 1998 में उनकी कार्यवाहक सरकार ने इस राजस्व-हिस्सेदारी योजना की शुरुआत की। इसने निजी कंपनियों को लाइसेंस शुल्क के रूप में एकमुश्त लाइसेंस फीस के अपने राजस्व के बजाय एक हिस्सा देने की अनुमति दी जिसे उन्होंने 1994 में लाइसेंस की नीलामी के दौरान भुगतान करने के लिए सहमति दी थी।

इस लेख के लेखक ने दे डेल्ही साइंस फोरम ने सरकार के इस निर्णय को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। हमने तर्क दिया था कि इन निजी कंपनियों ने लाइसेंस शुल्क का भुगतान न करने के मुकम्मल इरादे से अपने लाइसेंस हासिल किए थे और फिर बंधन मुक्ति के लिए सरकार से मिले रहे जिससे लाइसेंस की शर्तों में ढील दिया गया। अदालत ने इस मामले में अंतिम निर्णय कभी नहीं दिया जबकि केवल अंतरिम आदेश दिया।

15% एजीआर के रूप में लाइसेंस शुल्क पहले तय करके सरकार द्वारा उच्च प्रारंभिक लाइसेंस फीस का मुद्दा “हल” किया गया था फिर इसे क्रमशः ए, बी और सी-प्रकार के सर्किल के लिए 12%, 10% और 8% तक क्रमशः कम किया गया। तब फिर इसे 8% तक लाया गया। अनुभव के बाद – लाइसेंस-परमिट राज अब लाइसेंस-टू-लूट राज बन गया था – दूरसंचार कंपनियों ने जब अपने एजीआर का हिसाब किया तो अपने सकल राजस्व के समायोजित ’हिस्से’ में क्या शामिल किया जाना चाहिए उसको लेकर विवाद शुरू कर दिया। उन्होंने इस विवाद को तब शुरू किया जब डीओटी द्वारा जारी किए गए लाइसेंस ने स्पष्ट रूप से कहा था कि एजीआर में क्या शामिल होगा और क्या नहीं शामिल होगा।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला यह बताता है कि कंपनी द्वारा जारी और स्वीकार किया गया लाइसेंस एक अनुबंध है और कोई पक्ष पूर्वव्यापी अनुबंध की शर्तों की पुनर्व्याख्या नहीं कर कर सकता है। ये फैसला व्याख्या करता है कि लाइसेंस में परिभाषित समायोजन (एडजस्टमेंट) को पूरा किया जाना चाहिए और लाइसेंस में एजीआर के हिस्से के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल शुल्क को लाइसेंस शुल्क के रूप में भुगतान किया जाना है।

अब सवाल है कि टेलीकॉम सेक्टर के लिए अब क्या होगा? यह स्पष्ट है कि इस सेक्टर में मूल्य की लड़ाई समाप्त हो गई है और हमारे पास अब कीमतों को बढ़ाने के लिए एक साथ काम करने वाले तीन प्रमुख निजी कंपनियों का स्पष्ट संघ है। उन्होंने इस फैसले के बाद वॉयस और डेटा दोनों के लिए कॉल की कीमत बढ़ा दी है, जबकि सरकार इस बात को लेकर चकित है कि पूर्ण लाइसेंस शुल्क का भुगतान न करने के अपने खुद के थोपे गए परेशानियों से बचने के लिए उसे और क्या रियायत करने होंगे।

सभी निजी कंपनियों की घोषणाएं एक ही दिन हुई हैं; और हालांकि टैरिफ में कुछ अंतर हैं और वे सभी समान दर्जे के हैं। यह साफ तौर से कपटपूर्ण तरीका है। जियो अपने वित्तीय दबदबे के साथ अब एयरटेल और आइडिया-वोडाफोन को पछाड़कर अपने ग्राहकों की हिस्सेदारी के साथ बाजार के आग्रणी कंपनी के रूप में उभरा है। यह अब अन्य दो निजी कंपनियों के लिए शर्तें तय करेगा।

सरकारी कंपनी बीएसएनएल और एमटीएनएल वित्तीय संकट से जूझ रही है और खासकर इस सरकार ने इन कंपनियों को कमज़ोर कर रही और निजी कंपनियों को लाभ देने के लिए इन कंपनियों को मजबूर कर रही है। लेकिन अगर वे एयर इंडिया के मार्ग को अपनाते हुए बंद हो जाती हैं तो तो लोगों को नए टेलीकॉम संघों से कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी जो क़ीमतों की लड़ाई के बाद सामने आए हैं।

हम जियो के दूरसंचार व्यवस्था की अलग से जांच करेंगे क्योंकि यह स्वतंत्र व्याख्या के योग्य है। एक नया एकाधिकार बनाने के लिए इसका व्यवसाय मॉडल इसके विशाल नकदी भंडार को अन्य गतिविधियों से इस्तेमाल करना रहा है। यह लेन-देन न केवल दूरसंचार ग्राहकों पर बल्कि अन्य व्यवसायों को लेकर है जो इस बुनियादी ढांचे पर निर्माण करना चाहता है। यह एक नया डेटा और मनोरंजन एकाधिकार बनाने के लिए अपने दूरसंचार बुनियादी ढांचे का लाभ उठाने की योजना बना रहा है जैसा कि नेटफ्लिक्स का अमेज़ॅन और गूगल से प्रतिस्पर्धा है। यह एक नया डेटा एकाधिकार होगा जो इसके अंतर्निहित दूरसंचार एकाधिकार पर बनाया जाएगा। यह हमारे भविष्य के लिए ख़तरा है जो कि बाहरी दुनिया के साथ हमारी सभी बातचीत जियो से होकर गुज़रेगी। हम तेज़ी से जियो के माध्यम से ही ज़िंदा रहेंगे। पर यह दूसरे दिन की एक कहानी है।

प्रबीर पुरकायस्थ (न्यूज क्लिक से साभार )

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