भुवनेश्वर मासा कन्वेंशन में पारित प्रस्ताव

8 जनवरी, 2019 की देशव्यापी हड़ताल के समर्थन सहित श्रम संहिताओं के विरोध, मज़दूर-कर्मचारियों के संघर्ष से सॉलिडेरिटी, निजीकरण-छंटनी-बंदी आदि के मुखालफ़त के साथ कई राजनैतिक प्रस्ताव पारित

1-2 दिसंबर 2019 को भुवनेश्वर में मासा की अखिल भारतीय बैठक व कन्वेंशन में सर्वसम्मति से 8 प्रस्ताव पारित हुए :

  1. मासा तमाम मज़दूर-विरोधी श्रम संहिता विधेयकों की तत्काल वापसी की मांग करता है (जिसमें औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक जिसे संसद के अभी चल रहे शीतकालीन सत्र में कुछ प्रावधानों के प्रस्तावों के साथ पेश किया गया है जैसे ‘फिक्स्ड टर्म इम्प्लॉयमेंट’, यूनियन का गठन और हड़ताल करना बाधित करने के लिए और कड़े कानून, मज़दूरों को हायर व फायर करने की सुविधा, व अन्य, और मज़दूरी संहिता विधेयक के लिए प्रस्तावित केंद्रीय नियम, जिसमें 9 घंटे के कार्यदिवस का प्रावधान है जिसे 16 घंटों तक भी बढ़ाया जा सकता है, शामिल है)। मासा इन श्रम संहिता विधेयकों को भारतीय मज़दूर वर्ग के लंबे काल के संघर्ष और कुर्बानियों द्वारा मुश्किल से जीते गए अधिकारों को ध्वस्त करने के लिए एक कॉर्पोरेट-पक्षीय कदम मानता है। मासा इन सुधारों के खिलाफ पूरे देशभर में मज़दूर वर्ग के जुझारू संघर्ष को सशक्त करने का संकल्प लेता है।
  2. मासा निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा आर्थिक मंदी का बहाना देकर मज़दूरों की छंटनी के लिए उठाये गए कदमों का कड़ा विरोध करता है और सभी निकाले गए मज़दूरों की बहाली की मांग करता है। मासा कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती और संकट का बोझ मज़दूरों पर डाल देने जैसे सरकारी कदमों का विरोध करता है।
  3. मासा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों जैसे रेलवे, आर्डिनेंस, पेट्रोल, माइनिंग, टेलीकॉम, एयरलाइन उद्योग आदि के निजीकरण व निगमीकरण का कड़ा विरोध करता है। मासा की समझ से इस मज़दूर-विरोधी नवउदारवादी एजेंडा के ख़िलाफ़ एक जुझारू संघर्ष की फौरी ज़रूरत है। मासा बंदी, छंटनी, वीआरएस/सीआरएस जैसे कदमों व नई पेंशन योजना का विरोध करता है।
  4. मासा 8 जनवरी 2020 के अखिल भारतीय मज़दूर हड़ताल के आह्वान को समर्थन देता है और श्रम कानूनों में मज़दूर-विरोधी सुधारों, छंटनी, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण, बढ़ती ठेकेदारी प्रथा, रोज़गार की अनौपचारिकता, ट्रेड यूनियन आंदोलन पर दमन के खिलाफ, और ₹25,000 मासिक न्यूनतम वेतन, सार्वत्रिक सामाजिक सुरक्षा, श्रम और जीवन की गरिमा और मज़दूर वर्ग के अन्य अधिकारों व मुद्दों के पक्ष में मज़दूर वर्ग को इसे बड़े स्तर पर सफल करने का आह्वान करता है। मासा मज़दूर वर्ग से हड़ताल को एक एक-दिवसीय रस्मअदायगी तक सीमित नहीं रख कर इसे मज़दूर-विरोधी नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ एक वास्तविक व्यापक जुझारू संघर्ष में बदल देने का आह्वान करता है।
  5. मासा मानेसर होंडा मज़दूरों, रुद्रपुर माइक्रोमैक्स भगवती प्रोडक्ट्स मज़दूरों, काशीपुर ऋचा मज़दूरों, आदि का छंटनी के ख़िलाफ़ चल रहे संघर्ष, भिन्न पीएसयू मज़दूरों और खास तौर पर तेलंगाना परिवहन मज़दूरों का निजीकरण के खिलाफ संघर्ष, भिन्न असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों का सामाजिक सुरक्षा और ‘मज़दूर’ होने की पहचान व अधिकार पाने का संघर्ष व देशभर में ऐसे तमाम संघर्षों का पूरी तरह समर्थन करता है और सॉलिडेरिटी व्यक्त करता है।
  6. मासा जेएनयू और देशभर व देश के बाहर के शिक्षण संस्थाओं में फीस वृद्धि और शिक्षा का निजीकरण के विरोध में संघर्षरत छात्रों का पूरा समर्थन करता है और सॉलिडेरिटी व्यक्त करता है। मासा सभी के लिए निःशुल्क व समान शिक्षा व स्वास्थ्य की मांग करता है। मासा की नज़र में नवउदारवादी फरमानों के अनुसार इन दो क्षेत्रों का निजीकरण करने के लिए उठाये गए किसी भी कदम की मार मज़दूर आबादी व समाज में हाशिये पर खड़े तबकों पर सबसे ज़्यादा पड़ेगी।
  7. मासा महिलाओं के खिलाफ किसी भी प्रकार की हिंसा की भर्त्सना करता है और हैदराबाद में महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार व हत्या की घटना और पूरे देश में बलात्कार की अन्य घटनाओं की सबसे कड़ी शब्दों में भर्त्सना करता है, और दोषियों को सज़ा देने व महिलाओं, जिसमें कामगार महिलाएं भी शामिल हैं, के लिए सकुशल और सुरक्षित माहौल की मांग करता है। मासा दोषियों की धार्मिक पहचान उभार कर बलात्कार की इन घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देने की किसी भी कोशिश और बंटवारे की राजनीति को जनता के बीच फैलाने की भर्त्सना करता है।
  8. मासा किसी भी रूप में जनता के जनवादी अधिकारों पर हमलों का विरोध करता है। मासा अनुछेद 370 को हटाने व राजकीय और मिलिट्री दमन के ज़रिए कश्मीरी जनता के जनवादी आकांक्षाओं पर दमन की भर्त्सना करता है। मासा यूएपीए कानून, आरटीआई अधिनियम, एनआईए अधिनियम आदि में जनविरोधी सुधारों द्वारा जनवादी अधिकारों पर हमलों का विरोध करता है। मासा केंद्रीय सरकार द्वारा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को अंजाम देने के लिए पारित अखिल भारतीय एन.आर.सी. और नागरिकता (संशोधन) विधेयक जैसे प्रस्तावित कदमों का विरोध करता है। मासा का मानना है कि बाबरी मस्जिद-राम मंदिर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण था क्योंकि वह संविधान पर आधारित ना हो कर बहुसंख्यक धार्मिक आस्था पर ज़्यादा आधारित था। फ़ासीवादी ताकतें बड़े पूंजीपतियों के पूर्ण समर्थन से बांटने और भटकाने वाली धार्मिक उन्माद, नफरत और उग्रराष्ट्रवाद की नीतियों का इस्तेमाल मेहनतकश वर्ग को बांटने और उनका ध्यान मज़दूर वर्ग के मुद्दों पर से भटकाने के लिए कर रही है। मासा शासक वर्ग की बांटने वाली हर नीति का विरोध करता है और व्यापक मज़दूर वर्गीय एकता का आह्वान करता है।
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