सत्ता के एजेण्डे और न्यायिक सक्रियता

आज नीचे से लेकर ऊपर तक देश की न्यायपालिकाएं सरकार के एजेण्डे को खुलकर लागू कर रही हैं। मारुति-प्रिकॉल-गर्जियानों के बेगुनाह मज़दूरों को जमानत तक नहीं मिल रही है, लेकिन किसानों की जमीन हड़पने वाले अडानी के लिए न्यायालय पूरी तरह तत्पर है। सत्ता विरोधियों पर कार्रवाई हो अथवा संघ के एजेण्डे पर न्यायपालिका की सक्रियता, इस बात का प्रमाण है कि सत्ता केन्द्र की चाहत ही न्यायपालिकाओं के फैसले बन रहे हैं। बाबरी मस्ज़िद-राम जन्मभूमि पर आया फैसला इसकी एक बानगी है।

बाबरी मस्ज़िद-राम जन्म भूमि फैसला : एक चिन्तनीय स्थिति

बहुप्रतीक्षित बाबरी मस्ज़िद-राम जन्म भूमि मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि हिंदू पक्ष ”राम लला विराजमान“ को दे दी और मुसलमानों को अयोध्या में कहीं अन्यत्रा 5 एकड़ ज़मीन मस्जिद हेतु उपलब्ध कराने की बात की।

सर्वोच्च अदालत ने अपने 1000 पेज से अधिक के फैसले में यह माना है कि 16 दिसम्बर 1949 तक मस्ज़िद में नमाज़ पढ़ी गयी और 22-23 दिसंबर 1949 की रात को बाबरी मस्ज़िद में चोरी छिपे मूर्तियां रखवाई गयीं जो कि गलत और अवैध था। सर्वोच्च अदालत ने यह भी माना कि 6 दिसम्बर 1992 को मस्ज़िद को ढहाया जाना एक गैर क़ानूनी कृत्य था। अदालत ने यह भी माना कि 1934 से 6 दिसम्बर 1949 तक मस्ज़िद में लगातार नमाज़ पढ़ी जा रही थी और उसके बाद भी जुमे की नमाज अदा की जाती रही है। लेकिन इन तथ्यों को जानने और मानने के बावजूद सर्वोच्च अदालत ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन हिन्दू पक्ष फ्राम लला विराजमानय् को दे दी। इस तरह बाबरी मस्ज़िद ढहाने वालों को ही बाबरी मस्ज़िद की जमीन पर कब्ज़ा मिल गया।

न्यायालय ने अपने इस फैसले में मिथकों और कपोल कल्पनाओं पर आधारित कहानियों व मिथकों को ठोस तथ्यों पर और हिन्दू आस्था को कानून व न्याय पर वरीयता देते हुए साम्प्रदायिक ताकतों के आगे घुटने टेक दिए। यह एक तरीके से हिन्दू कट्ट्टरपंथियों द्वारा फैलाये मिथक को काफी हद तक वैधानिकता और प्रमाणिकता भी प्रदान करता है।

न्याय के सिद्धान्त के विपरीत

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही मूलभूत तर्कों के खि़लाफ जाकर यह निर्णय दिया है जो कि न्याय के सिद्धांत की जगह संघ-भाजपा के दबाव में लिया गया एक राजनीतिक फैसला है।
इसके तुरंत बाद विश्व हिन्दू परिषद ने तो 35000 मस्ज़िदों को तोड़कर मन्दिर बनाने की घोषण भी कर दी। यही नहीं, सबरीमाला मन्दिर के फैसले की धज्जी उड़ाने वाले न्यायपालिका के सम्मान की शोर मचा रहे हैं!

इस फैसले ने देश के अल्पसंख्यकों के न्याय पाने के भरोसे को भी खत्म कर दिया है। इसने संघ के भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत पर हमले को वैधानिकता प्रदान करके भविष्य के लिए एक ख़तरनाक़ संकेत भी दिया है। इसने भारतीय राज्य व राजनीतिक प्रतिष्ठानों के कथित धर्मनिरपेक्षता के आवरण की पोल खोल दी है। गौरतलब है कि कांग्रेस सहित सभी मुख्य पूँजीवादी पार्टियों ने इस फैसले का समर्थन किया है।

न्यायिक सक्रियता किसके हित में

आज नीचे से लेकर ऊपर तक देश की न्यायपालिकाएं सरकार के एजेण्डे को खुलकर लागू कर रही हैं। मारुति-प्रिकॉल-गर्जियानों के बेगुनाह मज़दूरों को जमानत तक नहीं मिल रही है, लेकिन किसानों की जमीन हड़पने वाले अडानी के लिए न्यायालय पूरी तरह तत्पर है। सत्ता विरोधियों पर कार्रवाई हो अथवा संघ के एजेण्डे पर न्यायपालिका की सक्रियता, इस बात का प्रमाण है कि सत्ता केन्द्र की चाहत ही न्यायपालिकाओं के फैसले बन रहे हैं।

बाबरी मस्ज़िद-राम जन्मभूमि पर यह फैसला इसकी एक बानगी है। इसी के साथ सत्ताधरी भाजपा ने आनन-फ़ानन में इसपर मनमापिफ़क फ़ैसला करवाकर जनता को कुछ दिनों तक नशे की एक और बड़ी खुराक दे दी है।

असल मामला कुछ और है

आज देश के हालात बेहद नाजुक़ हो चुके हैं। निजीकरण-छँटनी-बन्दी, महँगाई-बेरोजगारी, भुखमरी-अत्महत्याएं रोज नये रिकॉर्ड बना रहे हैं। इसी के साथ समाज के भीतर इंसान को इंसान के दुश्मन के तौर पर उसी तेजी से खड़ा किया जा रहा है।

दरअसल मोदी के नेतृत्व में संघ-भाजपा बड़े ही खूबसूरती व तेजी से जो एजेण्डे लागू कर रहे हैं, उनमें एक तीर से कई निशाने साध रहे हैं। बड़े पूँजीपतियों के हित में कुशलता से नीतियाँ लागू करना; संघ के कथित हिन्दूवादी नीतियों को थोप देना और हर तरह के प्रतिरोध को ठंडा करने के लिए कथित राष्ट्रभक्ति के नशे की खुराक कुशलता से परोसना।

पूँजीपतियों के हित में नीतिगत तेजी

देश और दुनिया के पूँजीवादी लुटेरों को जिस ‘विकास’ की तेज रफ्तार चाहिए, जिसकी गति पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में धीमी थी, उसे तेजी से बेरोकटोक लागू करने में मोदी सरकार फिट बैठी है। चाहें लम्बे संघर्षों के दौरान हासिल श्रम क़ानूनी अधिकारों को छीनने की तेज रफ्तार हो, जनता के खून-पसीने से खड़े सार्वजनिक उपक्रमों को अडानियों-अम्बानियों के हवाले करना हो, बढ़ते मंदी के संकट का बोझ खुलेआम जनता के मत्थे डालना हो या फिर सरकारी कर्मचारियों तक को जबरिया अवकाश देकर घर बैठा देने की योजनाओं (सीआरएस) को दबंगई से लागू करना हो। इसलिए मुनाफाखोरों के प्रियतम बने हुए हैं ज़नाब मोदी!

संघ के एजेण्डे से कॉर्पोरेट का ही लाभ

दूसरी ओर आजादी की लड़ाई के दौर में अंग्रजों की सरपरस्ती में कथित हिन्दुत्व का जो एजेण्डा संघ ने बना रखा था, उसे लागू करके जनता का ध्यान बाँटने का सबसे मुफीद वक़्त आर्थिक संकट का दौर ही होता है। महँगाई-बेरोजगारी से त्रास्त आम जनता के लिए ऐसे वक़्त में राष्ट्र, कश्मीर, राममंदिर, पकिस्तान के नाम पर भरमाना आसान हो जाता है। ज़नाब मोदी की सरपरस्ती में कश्मीर, धारा-370, अयोध्या मन्दिर-मस्ज़िद, समान नागरिकता, नागरिकता रजिस्टर जैसे मुद्दे उसी तेजी से लागू हो रहे हैं। इससे पूँजीपतियों को कोई हानि नहीं है, बल्कि उनके हितोनुरूप नीतियों को लागू करने की बाधाएँ इससे कमजोर पड़ रही हैं। इसलिए संघ और कॉर्पोरेट दोनो खुश हैं।

नशे की खुराक देने में कुशलता

तीसरा, रोजी-रोटी जैसी बुनियादी समस्याओं से त्रास्त आम मेहनतकश जनता को एक के बाद एक गैर मुद्दों के नशे की ख़ुराक़ देने में मोदी-शाह एण्ड कम्पनी सिद्धहस्त हो चुकी है। यह बेहद अहम इसलिए है, क्योंकि यह पहले दोनो एजेण्डों और कुलमिलाकर वैश्विक पूँजी के एजेण्डों को लागू करने को सुगम बनाता है।

अभी हालिया उदाहरण देखें- ख़तरनाक़ वेतन संहिता पारित हुई, रेलवे निजी हाथों में गया, आर्थिक संकट गहराने के साथ तमाम फैक्ट्रियां छँटनी-बंदी की शिकार हैं। ठीक इसी दौर में कश्मीर फिर अयोध्या मसले पर जिस तरीके से एजेण्डे लागू हुए, इससे जनता का एक हिस्सा वास्तविक संकटों को भूलकर इसमें मस्त हो गया, तो अल्पसंख्यक आबादी का हिस्सा डरा-सहमा है।

असल मुद्दा ग़ायब!

‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका, नवम्बर-दिसंबर, 2019 में प्रकाशित

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