इस सप्ताह : वशिष्ठ अनूप के गीत व गज़लें

इसलिए राह संघर्ष की हम चुनें / वशिष्ठ अनूप

इसलिए राह संघर्ष की हम चुनें
ज़िंदगी आँसुओं में नहाई न हो,
शाम सहमी न हो, रात हो ना डरी
भोर की आँख फिर डबडबाई न हो। इसलिए…

सूर्य पर बादलों का न पहरा रहे
रोशनी रोशनाई में डूबी न हो,
यूँ न ईमान फुटपाथ पर हो खड़ा
हर समय आत्मा सबकी ऊबी न हो;
आसमाँ में टँगी हों न खुशहालियाँ
कैद महलों में सबकी कमाई न हो। इसलिए…

कोई अपनी खुशी के लिए ग़ैर की
रोटियाँ छीन ले, हम नहीं चाहते,
छींटकर थोड़ा चारा कोई उम्र की
हर खुशी बीन ले, हम नहीं चाहते;
हो किसी के लिए मखमली बिस्तरा
और किसी के लिए इक चटाई न हो। इसलिए…

अब तमन्नाएँ फिर ना करें खुदकुशी
ख़्वाब पर ख़ौफ की चौकसी ना रहे,
श्रम के पाँवों में हों ना पड़ी बेड़ियां
शक्ति की पीठ अब ज़्यादती ना सहे,
दम न तोड़े कहीं भूख से बचपना
रोटियों के लिए फिर लड़ाई न हो। इसलिए…

जिस्म से अब न लपटें उठें आग की
फिर कहीं भी न कोई सुहागन जले,
न्याय पैसे के बदले न बिकता रहे
क़ातिलों का मनोबल न फूले–फले;
क़त्ल सपने न होते रहें इस तरह
अर्थियों में दुल्हन की विदाई न हो। इसलिए…


जो भूखा है / वशिष्ठ अनूप

जो भूखा है छीन झपटकर खाएगा
कब तक कोई सहमेगा शरमाएगा

अपनी भाषा घी शक्कर सी होती है
घैर की भाषा बोलेगा हकलाएगा

चुप रहने का निकलेगा अंजाम यही
धीरे धीरे सबका लब सिल जाएगा

झूठ बोलना हरदम लाभ का सौदा है
सच बोला तो जान से मारा जाएगा

जारी करता है वह फतवे पर फतवा
नंगा दुनिया को तहजीब सिखाएगा

मजबूरी ही नहीं जरूरत है युग की
गठियल हाथों में परचम लहराएगा


ये क्या हो गया है हमारे शहर को / वशिष्ठ अनूप

जलाते हैं अपने पड़ोसी के घर को
ये क्या हो गया है हमारे शहर को।

समन्दर का पानी भी कम ही पडेगा
जो धुलने चले रक्तरंजित नगर को।

सम्हालो ज़रा सिर फिरे नाविकों को
ये हैं मान बैठे किनारा भँवर को।

मछलियों को कितनी ग़लतफ़हमियाँ हैं
समझने लगीं दोस्त खूनी मगर को।

दिखा चाँद आरै ज्वार सागर में आया
कोई रोक सकता है कैसे लहर को।

मैं डरता हूँ भोली निगाहों से तेरी
नज़र लग न जाये तुम्हारी नज़र को।

परिन्दो के दिल में मची खलबली है
मिटाने लगे लोग क्यों हर शज़र को।

समन्दर के तूफां से वो क्या डरेंगे
चले ढूंढने हैं जो लालो-गुहर को।

उठो और बढ़ो क्योंकि हमको यकीं है
हमारे कदम जीत लेंगे सफर को।


खेलते मिट्टी में बच्चों की हंसी अच्छी लगी / वशिष्ठ अनूप

खेलते मिट्टी में बच्चों की हंसी अच्छी लगी
गाँव की बोली हवा की ताज़गी अच्छी लगी।

मोटी रोटी साग बथुवे का व चटनी की महक
और ऊपर से वो अम्मा की खुशी अच्छी लगी।

अप्सराओं की सभा में चहकती परियों के बीच
एक ऋषिकन्या सी तेरी सादगी अच्छी लगी।

सभ्यता के इस पतन में नग्नता की होड़ में
एक दुल्हन सी तेरी पोशीदगी अच्छी लगी।

दिल ने धिक्कारा बहुत जब झुक के समझौता किया
जु़ल्म से जब भी लड़ी तो ज़िन्दगी अच्छी लगी।


अक्षर-अक्षर ,तिनका-तिनका चुनना पड़ता है / वशिष्ठ अनूप

अक्षर-अक्षर ,तिनका-तिनका चुनना पड़ता है,
भीतर-भीतर कितना कहना-सुनना पड़ता है।

चिड़िया जैसे नीड़ बनाती है तन्मय होकर,
कविता को भी बहुत डूबकर बुनना पड़ता है।

दुहराना पड़ता है सुख-दुख को हँसकर-रोकर,
यादों में खोकर अतीत को गुनना पड़ता है।

इतनी गुत्थमगुत्था हो जाती हैं कुछ यादें,
जज़्बातों को रुई- सरीखा धुनना पड़ता है।



रचनाकार: डॉ. वशिष्ठ अनूप

१ जनवरी १९६२ को गोरखपुर के बड़हलगंज ब्लॉक के सहड़ौली गाँव में जन्म। गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए., पीएच-डी। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल वि.वि. जौनपुर से ‘हिंदी गज़ल उपलब्धियाँ और संभावनाएँ’ विषय पर डी.लिट.।

गीत गज़ल छंदमुक्त कविता और आलोचना विधाओं में सृजन। हिंदी गजल के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और नाट्यकर्मी। कुछ गीत फ़िल्मों और धारावाहिकों में। लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। अभिनय, निर्देशन और अध्यापन में संलग्न।

संप्रति: प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी


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