गुड़गांव मानेसर के मज़दूरों ने किया जेएनयू छात्रों का समर्थन

22 दिनों से होंडा मजदूरों का संघर्ष जारी, मजदूरों ने कहा- सरकार केवल मजदूर और मजदूर के बच्चों को कर रही है बर्बाद

मानेसर। गैरकानूनी छंटनी के ख़िलाफ़ होंडा स्कूटर, मानेसर के मजदूरों का संघर्ष पिछले 22 दिनों से जारी है। इस बीच गुड़गांव मानसर धारूहेड़ा से नीमराना के यूनियन प्रतिनिधियों व ट्रेड यूनियन कौंसिल ने संघर्षरत होंडा मज़दूरों के साथ सर्वसम्मति से जेएनयू के छात्र-छात्राओं के न्यायसंगत आन्दोलन के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया और दमन का विरोध किया, जिसे होंडा मज़दूरों के बीच ऐलान किया और कहा कि सरकार केवल मजदूर और मजदूर के बच्चों को कर रही है बर्बाद।

उल्लेखनीय है कि पिछले 5 दिसंबर से होंडा मानेसर के प्रबंधन ने करीब 500 ठेका मजदूरों की उत्पादन और माँग ना होने व मंदी के बहाने गेट बंद कर दिया था। वही प्लांट के स्थाई मजदूरों का पिछले 1 साल से वेतन समझौता लंबित है। इस अवैध छंटनी के विरोध में जहाँ 500 ठेका मज़दूर 4 नवम्बर से कंपनी गेट के बाहर धरनारत रहे, वहीँ करीब 14 दिनों तक प्लांट के अंदर उत्पादन रोक कर बैठने के बाद 1500 ठेका श्रमिक 17 नवम्बर को ट्रेड यूनियनों के आश्वासन पर प्लांट से बाहर निकले।

होंडा मानेसर में 4 नवंबर से अवैध छंटनी को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच प्रबंधन ने आज 19 वें दिन यूनियन के प्रधान सुरेश गौड़ सहित 3 यूनियन नेताओं सहित 6 मज़दूरों को निलंबित कर दिया है। इसके अलावा प्रबंधन ने 25 नवंबर से प्लांट में उत्पादन शुरू करने का निर्देश जारी किया है जिसके लिए सभी कर्मचारियों को 25 नवंबर से अलग-अलग एम्पलाई कोड के हिसाब से प्लांट में काम पर लौटने का आदेश जारी किया है। लेकिन मज़दूर संघर्ष के मोर्चे पर डटे हुए हैं।

जेएनयू क्यों है सत्ता के निशाने पर

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी जो पिछले कई दशकों से हिंदुस्तान में ही नहीं पूरे विश्व में साम्राज्यवादी सत्ताओं और उनकी अंधी श्रम और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ प्रभावी  भूमिका निभाती आ रही है। इसीको खत्म करने के लिए संघ-भाजपा की सत्ता जेएनयू को मिटाने के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद सभी हथकंडे अपनाए हुए हैं। इसीलिए सत्ता के चौतरफे हमले जेएनयू पर जारी हैं।

वर्तमान में हॉस्टल फीस, ट्यूशन फीस एवं मैनुअल में परिवर्तन के खिलाफ जेएनयू में चल रहे आंदोलन को प्रगतिशील तबके का समर्थन है। जेएनयू में फरवरी 2016 की घटना के बाद एमफिल और पीएचडी की सीटों में 90% तक कटौती कर दी गई है, लैंगिक उत्पीड़न के लिए बनी गई बनाई गई जीएसकैश कमेटी खत्म कर दी गई है।

जेएनयू को बदनाम करने के लिए संघ पोषित खेमा दिन-रात झूठा प्रचार जारी रखे हुए है। बीजेपी विधायक द्वारा जेएनयू में हजारों कंडोम मिलने की झूठी खबर हो या जेएनयू को देशद्रोही, आतंकवादीयों का अड्डा साबित करने के लिए सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम का मीडिया दिन-रात झूठे प्रचार में लगे रहते हैं। जेएनयू छात्रों के खिलाफ झूठे वीडियो रोजाना संघ-भाजपा के आईटी सेल से जारी किए जाते हैं। जेएनयू छात्रों पर झूठे मुकदमे भी सत्ता द्वारा प्रायोजित था।

फीस वृद्धि के खिलाफ जेएनयू छात्रों के समर्थन में सिटीजन मार्च

फीस बढ़ोत्तरी को लेकर जेएनयू छात्रों और अन्य संगठनों का प्रदर्शन जारी है। शनिवार 23 नवंबर को जेएनयू छात्रसंघ द्वारा सिटीजन मार्च निकाला गया। इसमें जेएनयू छात्रसंघ के अलावा सीपीआई, भीम आर्मी, एसएफआई, डीएसएफ, आईसा, पछास, कलेक्टिव सहित तमाम संगठनों ने भी हिस्सा लिया।

आम जनता का नारा है- “हम शिक्षा बचाने निकले हैं, आओ हमारे साथ चलो!”

जेएनयू सहित अन्य संस्थानों में फीस वृद्धि वापस लेने व सबको निशुल्क व समान शिक्षा की मांग को लेकर आज दिल्ली में मण्डी हाउस से जंतर मंतर तक ‘नागरिक मार्च’ निकाला। मार्च में हजारों की संख्या में मजदूर, महिला, दलित, शिक्षक व छात्र संगठनों ने भागीदारी की। प्रदर्शन के जरिए सत्ता के गलियारों तक सबको निशुल्क और समान शिक्षा मिलनी चाहिए, माँग बुलंद हुई। यह हर नागरिक का अधिकार है।

प्रदर्शनकारियो का कहना था कि सरकार का काम जनता से प्राप्त टैक्स, जनता के शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी चीजों पर खर्च करें। परंतु मोदी सरकार लगातार इन चीजों का निजीकरण कर अंबानी-अणानी की तिजोरी भरने का काम कर रही है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि \निशुल्क व समान शिक्षा के लिए सरकार और शिक्षा को माल बनाने वाली इस पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़े हों।

ज्ञात हो कि जेएनयू के छात्र-छात्राओं का यह न्यायपूर्ण आन्दोलन करीब एक माह से चल रहा है।

जेएनयू छात्रों से पुलिसिया बर्बरता

फीसवृद्धि के खिलाफ जेएनयू के छात्रों के एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बर्बरता की सारी सीमाएं पार कर दीं। वह पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा महिला छात्रों के साथ बदसलूकी हो या फिर सादे लिबास में छात्रों के बीच घुसकर उनकी बर्बर पिटाई का मामला, हर जगह पर खाकीधारी बेहद खूंखार दिखे। यहाँ तक कि उन्होंने शशिभूषण समद जैसे दृष्टिहीन और विकलांग छात्रों तक को नहीं बख्शा और उनके साथ शर्मनाक क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया।

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