22 नवम्बर को होंडा मजदूरों की आवाज़ होगी और बुलंद

ट्रेड यूनियन काउंसिल ने किया ऐलान, 22 नवम्बर को आई एम टी मानेसर से गुडगाँव डीसी ऑफिस तक निकलेगी रैली

पिछले 5 नवम्बर से होंडा मानेसर प्लांट के संघर्षरत ठेका मज़दूरों की आवाज़ बुलंद करने और संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए गुडगाँव-मानेसर-धारुहेरा-बावल-नीमराना की सभी ट्रेड यूनियनों के समर्थन से 22 नवम्बर को मज़दूर आई एम टी मानेसर से गुडगाँव डीसी ऑफिस तक अपनी मांगों को लेकर रैली करेंगे. इसका निर्णय 20 नवम्बर को ट्रेड यूनियन काउंसिल की मानेसर में हुई बैठक में हुआ है. इसके साथ ही यह भी निर्णय बना कि 27 नवम्बर को मानेसर-गुडगाव औद्द्योगिक क्षेत्र में सभी औद्योगिक विवादों को लेकर हीरो होंडा चौक से डीसी ऑफिस गुडगाव तक रैली निकलेगी.

ज्ञात हो कि पिछले 5 नवम्बर से होंडा मानेसर प्लांट के लगभग डेढ़ हज़ार ठेका मज़दूर कंम्पनी द्वारा मंदी के बहाने अन्यायपूर्ण छंटनी के खिलाफ संघर्षरत है.

होंडा मज़दूर क्यों आंदोलित हुए

होंडा मैनेजमेंट हर 11 महीने में ठेका मज़दूरों का ठेका चेंज करके रि-जॉइनिंग करा देती है, ताकि सालों से स्थायी उत्पादन में काम कर रहे ठेका मज़दूर स्थायी बनने की माँग उठा न पाए. मगर 4 नवम्बर को मंदी के बहाने कंपनी ने ठेका मज़दूरों का एक हिस्सा, जिनका मार्च तक 11 महीना पूरा होना है, उनको नौकरी से निकाल दिया. 5 नवम्बर को सुबह छंटनी किये गए करीब 650 मज़दूर कंपनी गेट के बाहर और करीब हज़ार ठेका मज़दूर काम बंद करके कंपनी के अन्दर धरने पर बैठ गए. उत्पादन ठप्प हो गया.

स्थायी मज़दूरों से कंपनी ने उत्पादन जारी रखने का कोशिश तो की, मगर मुश्किल से 100-150 गाड़ियाँ दिन में बन पाई, जिन गाड़ियों को भी रिपेयरिंग के लिए भेजना पड़ा. 7 नवम्बर से उत्पादन बंद हो गया. 5 नवम्बर से 18 नवम्बर तक लगभग हज़ार ठेका मज़दूर प्लांट के अन्दर बैठे रहे. जबकि कंपनी ने एक को छोड़कर बाकि सब टॉयलेट बंद कर दिया था. दिन में खाने के लिए सिर्फ एक बार दूध-केला मिलता था, नहाने-धोने का मौका नहीं था. 33 मज़दूरों को डेंगू और अलग अलग बीमारी ने पकड़ लिया. फिर भी मज़दूरों हौसला बुलंद रखा. बाकि 650 मज़दूरों गेट के बाहर धरना जारी रखा.

अंततः 18 नवम्बर को सिविल कोर्ट के आदेश पर और प्रशासन के आश्वासन पर अन्दर के मज़दूर बाहर आये और कंपनी गेट के बाहर स्थायीकरण या पर्याप्त मुआवज़ा के मांगों को लेकर धरना दिया जो अभी भी चल रहा है. श्रम विभाग के अधिकारीयों और प्रशासनिक अधिकारीयों से ठेका मज़दूर प्रतिनिधि और होंडा यूनियन प्रतिनिधियों के बीच समझौता वार्ता चल रहा है.

क्यों है यह एक ऐतिहासिक आन्दोलन

हौंडा मज़दूरों का यह आन्दोलन एक ऐतिहासिक आन्दोलन का रूप लिया है. पूरे आद्योगिक क्षेत्र में पहली बार ठेका मज़दूरों ने किसी कंपनी में काम बंद करके 15 दिन तक प्लांट के अन्दर कब्जा करके बैठे रहे. शोषण और छंटनी के वावजूद पिछले एक समय आम तौर पर ठेका मज़दूर ज्यादा दूर तक लड़ नहीं पा रहे थे (डाईकिन, ओमैक्स, हीरो, अस्ति जैसे कुछ उदाहरणों को छोड़कर).

आर्थिक मंदी की मार ठेका और अस्थायी मज़दूरों पर ही सबसे ज्यादा पड़ा. हजारो की तादाद में ठेका मज़दूर अलग अलग कंपनियों से निकाले गए. मगर खास कोई प्रतिरोध बना नहीं पाए. ऐसी स्थिति में होंडा मज़दूरों का यह जुझारू संघर्ष यही बताता है कि मंदी का बोझ पूंजीपतियों और सरकार द्वारा मज़दूर वर्ग का सबसे असुरक्षित तबके पर थोपने की कोशिश मज़दूर सहन नहीं करेगा.

स्थाईकारण भी बंद, ठेकेदारी से भी निकला

होंडा के संघर्षरत सभी मज़दूर साथी काफी अनुभवी है. सभी मज़दूर 2014 के पहले से प्लांट में काम कर रहे है. कई मज़दूर 2008 के पहले के भी है. 11 महीने बाद इनकी रि-जॉइनिंग करवाया जाता है. पहले हर साल 50 मज़दूर को वरिष्ठता के आधार पर और 50 मज़दूरों को टेस्ट के आधार पर स्थायी किया जाता था. मगर अभी 4 साल से टेस्ट बंद हो गया है. वरिष्ठता के आधार पर भी इस साल किसी को स्थायी नहीं किया गया.

2014 के जिन मज़दूरों को ठेका पर लिया गया था, उनको हर साल रि-जॉइनिंग नहीं करवाया गया, बीच बीच में निकाल दिया गया, ज्यादातर को एक साल के कॉन्ट्रैक्ट पर लिया गया. पिछले अगस्त महीने में करीब 800 मज़दूरों को दीपावली का बोनस व अन्य सुविधाएँ दिए बगैर कंपनी से निकाल दिया गया था, बोला गया था की बाद में ले लिया जायेगा. मगर किसीको नहीं लिया गया.

क्योंकि फोक़ट के नीम ट्रेनी मज़दूर मिल गए हैं

2018 से साल में 3-3 महीनों तक ठेका मज़दूरों को बिना वेतन ‘ब्रेक’ दिया गया. पिछले 2 साल से करीब 800 ‘नीम’ मज़दूर भर्ती किया गया है. ‘नीम’ ट्रेनी मज़दूरों को सिर्फ 11 हज़ार रुपये देना पड़ता है, जिसमे से आधा सरकार देती है. जबकि ठेका मज़दूरों को 16 हज़ार रुपये महीने में देना पड़ता है. ठेका मज़दूरों के वेतन में 2016 के बाद कोई बढ़ोतरी नहीं हुई. ठेका और नीम मज़दूर स्थायी मज़दूर जैसा ही काम करते है जबकि स्थायी मज़दूरों का वेतन महीने में 60-70 हज़ार है.

दमन के बाद 2005 में बनी थी यूनियन

पुलिसिया दमन को झेलकर काफी संघर्ष के बाद होंडा में 2005 में यूनियन बनी थी, जो मानेसर की पहली यूनियन थी. तब स्थायी मज़दूरों का वेतन भी सिर्फ 6500 रुपये प्रति महीना था. यूनियन बनने के बाद स्थायी मज़दूरों के वेतन में तो काफी बढ़ोतरी हुई, मगर ठेका मज़दूरों को ज्यादा फायदा नहीं मिला.

ठेका मज़दूरों ने पहले भी किया था संघर्ष

2008 और 2010 में भी होंडा के ठेका मज़दूरों ने संघर्ष किया था. पिछले सालों में भी कई बार बीच बीच में इनका गुस्सा फूटा था. मज़दूरों ने खाना बंद किया, काम रोक दिया. मगर इस बार जब नौकरी ही खतरे में आ गई तो उनको संघर्ष का रास्ता चुनना पड़ा.

ठेका-अस्थाई मजदूरों के लिए उम्मीद की किरण

होंडा मज़दूरों के संघर्ष का नतीजा लेगा अभी भी देखना है. अभी तक उन्हें होंडा यूनियन और इलाके की बाकि यूनियनों जैसे रिको, मारुति, बेलसोनिका, डाईकिन, होंडा 2F, मोजर बियर आदि का समर्थन और सहयोग मिला है. श्रम कानूनों को बदलकर नौकरी को और असुरक्षित करने के खिलाफ, मंदी का बोझ मज़दूरों पर थोपने के खिलाफ, ठेकाकरण के खिलाफ यह लड़ाई औद्योगिक क्षेत्र और देश के करोड़ों ठेका-अस्थायी मज़दूरों के बीच कोई उम्मीद और संघर्ष का जज्बा अगर पैदा कर सके तो मज़दूर आन्दोलन में एक महत्वपूर्ण घटना होगी.

भूली-बिसरी ख़बरे

%d bloggers like this: