मुक्तिकामी संघर्ष के प्रतीक पुरुष थे करतार सिंह सराभा

भगत सिंह के आदर्श अमर शहीद करतार सिंह सराभा के शहादत दिवस (16 नवम्बर) पर

अंग्रेजी गुलामी के दौर में देश की सच्ची आजादी के लिए बेशकीमती संघर्षों व कुर्बानियों से देश के इतिहास के पन्ने स्वर्णिम अक्षरों से भरे पड़े हैं। इन्हीं महान शूरवीरों में एक नाम है – करतार सिंह सराभा का। साढ़े उन्नीस साल के सराभा को उनके छह अन्य साथियों – बख्शीश सिंह, हरनाम सिंह, जगत सिंह, सुरैण सिंह, सुरैण, व विष्णु गणेश पिंगले – के साथ 16 नवम्बर, 1915 को लाहौर जेल में अंग्रेजी हुक़ूमत ने फांसी पर चढ़ा दिया था।

करतार सिंह सराभा भारत को अंग्रेजों की दासता और हर प्रकार की गुलामी से मुक्त करने के लिये अमेरिका में बनी गदर पार्टी के अध्यक्ष थे। 16 नवम्बर 1915 को करतार को जब फांसी पर चढ़ाया गया, तब वे मात्र साढ़े उन्नीस वर्ष के थे। करतार सिंह ने गदर पार्टी आंदोलन के लोक नायक के रूप में अपने बहुत छोटे-से राजनीतिक जीवन में अमिट छाप छोड़ी।

”जब तक कुछ लोग वे चाहे देशी हों या विदेशी हों या फिर दोनों आपसी सहयोग में हों, श्रम और हमारे लोगों के साधनों का शोषण जारी रखते हैं हमारी लड़ाई चलती रहेगी। हमें इस रास्ते से कोई नहीं हटा सकता।“
-करतार सिंह सराभा
(जन्म- 24 मई 1896 – शहादत-16 नवम्बर 1916)

आज़ादी की लड़ाई की इंक़लाबी कड़ी थी गदर पार्टी

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद आजादी के संघर्ष का एक नया दौर शुरू हुआ। उन्नीसवीं सदी के अंत तक आते-आते देश के अनेक भागों में क्रान्तिकारी गतिविधियां तेज होने लगीं। विदेशों में रह रहे भारतीयों ने भी संघर्ष की कमान संभाली। गदर आन्दोलन उसी का परिणाम था।

कनाडा और अमेरिका से लेकर इंग्लैंड, फ़्रांस, जर्मनी, जापान व अन्य अनेक देशों में पहुँचे भारतियों ने स्वतंत्रता की अलख जगाई। 1907 के स्टुगार्ड में हुए समाजवादी सम्मेलन में भीकाजी कामा ने पहली बार भारत का झंडा फहराया। जर्मनी में वीरेन्द्रनाथ चट्ट्टोपाध्याय, चंपक रमण पिल्लै और स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त भी सक्रिय रहे।

गदर पार्टी और करतार सिंह सराभा

दसवीं कक्षा पास करने के उपरांत करतार सिंह सराभा उच्च शिक्षा के लिए जब जनवरी 1912 में अमेरिका पहुँचे, उस वक्त पोर्टलैंड में भारतीय मज़दूरों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ, जिसमें बाबा सोहन सिंह भकना, हरनाम सिंह टुंडीलाट, काशीराम आदि ने हिस्सा लिया। ये सभी बाद में गदर पार्टी के महत्त्वपूर्ण नेता बन कर उभरे।

अमेरिका में वे बर्कले विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र के विद्यार्थी बने। यहाँ उस समय करीब तीस विद्यार्थी पढ़ रहे थे, जो दिसंबर, 1912 में लाला हरदयाल के संपर्क में आए। लाला जी ने विद्यार्थियों के सामने आजादी के जज्बे पर जोशीला भाषण दिया। लाला जी और भाई परमानंद ने उनके दिलों में क्रान्तिकारी भावनाएं पैदा करने में बड़ी भूमिका निभाई। धीरे-धीरे सराभा और उसके अन्य साथी गदर आंदोलन के सेनानी बनते गये।

ग़दर पत्रिका का संपादन

युवा अवस्था की दहलीज पर ही वे गदर आन्दोलन व पार्टी से जुड़े। ‘गदर’ पत्रिका के सहसम्पादक के रूप में उन्होंने लाला हरदयाल के साथ पत्रिका को वैचारिक और ओजस्वी धार दी। सोहन सिंह भाकना की गिरफ्तारी के बाद सराभा ने पार्टी के अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाई। कुल दो-तीन साल में ही सराभा अपने प्रखर व्यक्तित्व और क्रान्तिकारी जोश से देश के युवकों की आत्मा में बस गये। तभी तो शहीदे आज़म भगत सिंह के वे आदर्श बने।

जन विद्रोह का आह्वान

21 अप्रैल, 1913 को अमेरिका में बनी गदर पार्टी ने योजनाबद्ध रूप से ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ 19 फरवरी 1915 को भारत में ‘गदर’ की शुरुआत की थी। इसके लिए लगभग आठ हजार भारतीय सुख-सुविधाओं भरी जिंदगी छोड़ कर समुद्री जहाजों से भारत पहुँचे थे। यह सशस्त्र विद्रोह था। पार्टी के पत्र ‘गदर’, जो पंजाबी, हिंदी, उर्दू व गुजराती चार भाषाओं में निकलता था, के माध्यम से समूची भारतीय जनता से इस विद्रोह का आह्वान किया था।

उस आंदोलन में बंगाल से रास बिहारी बोस व शचीन्द्रनाथ सान्याल, महाराष्ट्र से विष्णु गणेश पिंगले व डॉ खानखोजे, दक्षिण भारत से डॉ चेन्चइया व चंपक रमण पिल्लै तथा भोपाल से बरकतुल्ला आदि ने हिस्सा लेकर उसे एक ओर राष्ट्रीय रूप दिया तो शंघाई, मनीला, सिंगापुर आदि अनेक विदेशी नगरों में हुए विद्रोह ने इसे अंतर्राष्ट्रीय रूप भी दिया। करतार सिंह इस आन्दोलन के नायक थे।

पार्टी सशस्त्र क्रान्ति द्वारा देश में एक ऐसे गणराज्य की स्थापना करना चाहती थी, जहाँ मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का खात्मा हो। 1857 की भांति ही गदर आंदोलन भी सही अर्थों में धर्म निरपेक्ष संग्राम था जिसमें सभी धर्मों व समुदायों के लोग शामिल थे।

विश्व स्तर पर चले इस आंदोलन में दो सौ से ज्यादा लोग शहीद हुए, 315 से ज्यादा ने अंडमान जैसी जगहों पर काले पानी की उम्रकैद भुगती और 122 ने कुछ कम लंबी कैद भुगती। सैकड़ों को वर्षों तक नजरबंदी झेलनी पड़ी।

”भारत में अनेक पंथ और धार्मिक संगठन अस्तित्व में आ रहे हैं, उनमें से प्रत्येक भारत को दासता से मुक्ति दिलाने की डींग हांकता है …किसी को किसी के खास मत और विचार पर कार्य करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। …भारत में रामसिंह, नाना साहेब, झांसी की रानी, तात्या, तिलक, अंबा प्रसाद सूफी और अजितसिंह जैसे देशभक्त पैदा हुए हैं परंतु इनका धर्म एक नहीं था। …यह सोचना मूर्खतापूर्ण है कि केवल एक ही धर्मिक संगठन सभी उद्देश्यों के लिए पर्याप्त होगा। …जनता की समृद्धि और सुख किसी खास पंथ पर आश्रित नहीं होता …स्वतंत्रता और समानता के प्रयत्नों का त्याग और अपनी समस्त रुचियों को केवल धर्म पर ही लगाना मनुष्य के स्तर से नीचे गिरना है।“
ग़दर पार्टी के पत्र ‘ग़दर’ में प्रकाशित लेख से

शहीदे आज़म भगत सिंह के आदर्श थे करतार सिंह साराभा

यह उल्लेखनीय है कि गदर पार्टी आंदोलन एक बड़े विद्रोह की असफलता से समाप्त नहीं हुई, बल्कि इसने और विस्तार लिया व भारत में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होकर व विदेशों में अलग अस्तित्व बनाए रखकर इसने भारत के स्वाधीनता संग्राम में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। आगे चल कर 1925-31 के दौर का क्रान्तिकारी आन्दोलन व युवा, जिसके लोकप्रिय नायक भगत सिंह बने, भी गदर पार्टी व करतार सिंह सराभा से प्रभावित रहा।

शहीदे आज़म भगत सिंह करतार सिंह साराभा को अपना आदर्श मानते थे और उनकी तस्वीर अपने पास रखते थे।

आज के दौर में जब देश गुलामी की नई बेडियो में जकड रहा है, साम्प्रदायिक और जातिवादी जूनून में देश की मेहनतकश आवाम उलझाया जा रहा है, आज़ादी की लड़ाई के गद्दारों को स्थापित करने का कुचक्र चल रहा है, ऐसे में करतार सिंह जैसे वीर शहीदों को याद करके उनकी विरासत को आगे बढ़ाना बेहद अहम है।

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