जारी है होंडा मज़दूरों का संघर्ष

दूसरे दिन भी 3000 ठेका मज़दूर हड़ताल पर रहे

होंडा मानेसर में लगातार दूसरे दिन भी करीब 3000 ठेका मज़दूर हड़ताल पर रहे। 2500 मजदूर प्लांट के अंदर और करीब 500 वर्कर मजदूर प्लांट के बाहर गेट के सामने धरने पर बैठे हैं। आर्थिक मंदी और प्रोडक्शन ना होने का बहाना लेते हुए होंडा प्रबंधन ने करीब 500 मजदूरों को 3 महीने के लिए नौकरी से ब्रेक देते हुए काम पर रखने से मना कर दिया।

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ज्यादातर मजदूर पिछले 10 सालों से प्लांट में कार्यरत है जो 30 से 40 आयु वर्ग के हैं। जिन मजदूरों को अगस्त में ब्रेक किया गया था अभी तक उन्हें भी काम पर नहीं लिया गया है कई मजदूरों को जो मार्च में जॉइनिंग पर आए थे। उन्हें 6 महीने बाद ही वापस काम से निकाल दिया गया है।

हौंडा कंपनी में कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे हैं श्रमिकों को 11 महीने पूरे होने पर 15 दिन का ब्रेक दिया जाता है उसके बाद उनकी वापस दूसरे ठेकेदार के अंदर री जोइनिंग कराई जाती है। पिछले साल से कंपनी में 3 महीने का ब्रेक देना शुरू कर दिया। मौजूदा मामले में जिन लोगों को दिसंबर, जनवरी और फरवरी में ब्रेक के बाद रिजोइनिंग होनी थी उन्हें नवंबर में ही काम पर आने से मना कर दिया गया इसके बाद आक्रोश में आते हुए मजदूरों ने काम बंद कर दिया। जहां मज़दूरों को पहले साल में एक ब्रेक दिया जाता था वहीं उन्हें अब दो तीन ब्रेक देकर जबरदस्ती काम से बैठाया जा रहा है। दरअसल दीपावली से पहले ही हौंडा प्रबंधन में ठेका मजदूरों की छंटनी शुरू कर दी थी।

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दिलचस्प बात यह है होंडा मानेसर प्लांट के परमानेंट श्रमिकों का वेतन समझौता जो 3 साल के लिए होता है, वह 2018 से लंबित है और इस नए वेतन समझौते के बाद स्थाई श्रमिकों की सैलरी करीब ₹100000 हो जाने की संभावना जो अभी 80000 से 90000 के बीच में है। होंडा कम्पनी का कहना है कि आर्थिक मंदी है ऑटोमोबाइल उद्योग की स्थिति ख़राब है इसलिए प्लांट में प्रोडक्शन नहीं है। वहीं आंकड़े और गुजरात, बैंगलोर और टप्पुकड़ा स्थित प्लांटों में प्रोडक्शन टारगेट कोई और हकीक़त बताता है। होंडा के इन सभी प्लांटों में प्रतिदिन 5500 से 6000 गाडियां बन रही है। सिर्फ़ मानेसर प्लांट में मंदी की आड़ में छंटनी करने के लिए प्रोडक्शन को 2700 यूनिट तक गिराया गया। पिछले त्यौहारी सीज़न में होंडा की वाहन बिक्री और निर्यात दोनों में बढ़ोतरी हुई है।

धरने पर बैठे मजदूरों की दो मुख्य मांगे हैं या तो उन्हें स्थाई किया जाए या फिर ₹100000 प्रति साल के हिसाब से उनका अंतिम हिसाब किताब कर दिया जाए। प्लांट में फ़िलहाल स्थाई मजदूरों की यूनियन ही इस मामले को नेतृत्व दे रही है और प्रबंधन के साथ लगातार वार्ता चल रही है मगर प्रबंधन किसी भी मांग को नहीं मान रहा है। आज गुड़गांव ट्रेड यूनियन काउंसिल और मारुति तथा अन्य यूनियनों और जनसंगठनों के लोगो ने डीएलसी को ज्ञापन दिया और धरनास्थल पर आकर मज़दूरों का हौसला बढ़ाया। आज रात भी ठंड और प्रदूषण के बीच मजदूर होंडा मानेसर के गेट के सामने धरना स्थल पर डटे हुए हैं।

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