नीम ट्रेनी यानी फ़ोक़ट के नए मज़दूर

रोजगार की नई किस्में-2 : अधिकार विहीन नीम ट्रेनी मज़दूर

मोदी सरकार द्वारा ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ यानी व्यापार को आसान बनाने का जो फण्डा है, वह मालिकों को लाभ पहुँचाने के लिए मज़दूरों को निचोड़कर फेंक देने का ख़तरनाक़ धंधा है। इसने स्थाई नौकरी की जगह ‘फिक्स्ड टर्म’ किया है, तो युवाओं की भारी आबादी को फोंक़ट का मज़दूर बना दिया है। मोदी-1 राज में स्किल डेवलपमेंट का जो नारा उछला, दरअसल उससे मालिकों के लिए फ़ोक़ट के नए मज़दूर तैयार हुए हैं। यानी कैजुअल और ठेका श्रमिकों का स्थान नीम-ट्रेनी के बहाने अधिकार विहीन मजदूरों ने ले लिया।

केन्द्र सरकार द्वारा 13 अक्टूबर 2017 को जारी अधिसूचना से राष्ट्रीय रोजगार क्षमता वृद्धि मिशन (नीम) नामक नया फण्डा सामने आया। मज़दूरों की गर्दन काटने वाला मालिकों के लिए तुरुप का यह पत्ता मोदी सरकार ने उस समय फेंका, जब घातक नोटबन्दी की सफलता के रूप में उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड में प्रचण्ड बहुमत से भाजपा की सरकारें बन चुकी थीं।

नीम ट्रेनी अन्दर ठेका श्रमिक बाहर

पिछले दो वर्षां के दौरान देखते ही देखते देशभर के तमाम कारखानों में नीम के तहत बड़े पैमाने पर मजदूरों की भर्ती हो गई। इसमें संविदा श्रमिकों का स्थान नीम ट्रेनी ने तो ठेकेदारों का स्थान नीम एजेंट के रूप में एनजीओ कंपनियों ने ले लिया। रोजगार क्षमता वृद्धि के नाम पर हो रही इन भर्तियों के साथ ही लंबे समय से कार्यरत ठेका मज़दूर बड़े पैमाने पर निकाले जा चुके हैं, और निकाले जा रहे हैं।

ना कर्मकार ना ही अपरेंटिस, ना ही कोई अधिकार

नीम ट्रेनी ना तो श्रम क़ानूनों के तहत कर्मकार की परिभाषा में आता है, ना ही वह अपरेंटिस ऐक्ट के तहत प्रशिक्षु है। वह कथित रूप से कौशल विकास के लिए नियुक्त वास्तव में फोक़ट का मज़दूर है।

कर्मकार की किसी परिभाषा में न आने से वह पीएफ, ईएसआई, बोनस आदि का पात्र नहीं है। उसे अकुशल श्रेणी के निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी अलग वृतिका (स्टाइपेंड) मिलता है, जो अलग-अलग राज्यों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। अभी यह हर माह औसतन 8500 रुपए है। स्टाइपेंड सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है। इसका पहले साल 75 फीसदी हिस्सा व दूसरे साल 60 फीसदी हिस्सा सरकार द्वारा देने का प्रावधान है।

क्या है नेशनल एंप्लॉयमेंट एनहांसमेंट मिशन (नीम)

सरकार के साथ मिलकर एनटीटीएफ इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग के इस प्रोग्राम को चला रहे संस्थान नेट्टूर टेक्निकल फाउंडेशन (एनटीटीएफ) एक एजुकेशन फाउंडेशन है। इसकी शुरुआत 1963 में हुई थी। एनटीटीएफ केंद्र सरकार के नेशनल एम्प्लॉएब्लिटी एनहांसमेंट मिशन (नीम) रेग्युलेशन 2013 के तहत काम करती है। ऐेसे में फाउंडेशन के लर्न एंड अर्न प्रोग्राम के तहत ट्रेनी के तौर पर चुने जाने वाले सभी लोग नीम ट्रेनी होते हैं।

ठेका श्रमिकों के स्थान पर नीम ट्रेनी

संविदा श्रमिकों का सप्लायर ठेकेदार होता है। लेकिन कौशल विकास के नाम पर फोक़ट के इन मज़दूरों का आपूर्तिकर्ता नीम एजेण्ट होगा। ठेकेदार श्रम विभाग में पंजीकृत होता है, जबकि नीम एजेण्ट और उसके द्वारा अपूर्ति किये जा रहे प्रशिक्षुओं के बारे में श्रम विभाग में पंजीकरण की बाध्यता नहीं है, क्योंकि वह श्रमिक नहीं है। उसका वास्ता कौशल विकास विभाग से है। हालांकि कई राज्यों में श्रम विभाग का नाम श्रम एवं कौशल विभाग हो गया है। वैसे भी नई स्थितियों में नीम ट्रेनी ठेका श्रमिकों का स्थान ले चुके हैं।

कम्पनी की हैसियत के अनुरूप होगी नीम ट्रेनी की संख्या

नीम एजेंट का मतलब है- नीम फैसिलेटर (सुविधा प्रदाता)। कम्पनी एक्ट 1956 की धारा 25 के तहत पंजीकृत सोसाइटी/ट्रस्ट/कम्पनी नीम एजेंट या फैसीलेटर की आवेदक हो सकती है। वह किसी भी पंजीकृत कम्पनी या उद्योग में अपनी है हैसियत के अनुसार कौशल विकास के बहाने इन फोक़ट के मज़दूरों (ट्रेनी) की सप्लाई देती है।

कथित प्रशिक्षुओं की संख्या भी कम्पनी की हैसियत से निर्धारित होते हैं, जो कि काफी अधिक है। 25 करोड़ से ऊपर टर्नओवर वाली कम्पनी में प्रति वर्ष 5000 प्रशिक्षु, 15-25 करोड़ रुपए टर्नओवर वाली कम्पनी को 3000 प्रशिक्षु और 5-15 करोड़ रुपए टर्नओवर वाली कम्पनी में 1000 प्रशिक्षु रखने का प्रावधान है।

यहाँ ग़ौरतलब है कि अपरेटिंस ऐक्ट के तहत स्थाई ऑपरेटर के अनुपात में ही प्रशिक्षु रखने का प्रावधान है, जो कि बेहद सीमित है। लेकिन नीम ट्रेनी के तहत यह कम्पनी के टर्न ओवर से निर्धारित हो रहा है। साफ है कि कम्पनी को जितने भी फोक़ट के मज़दूरों की आवश्यकता होगी, एनजीओ फैसीलेटर उन्हें मुहैया करायेगा।

16 साल के किशोर से भी काम कराने की छूट

इसके तहत 16 से 40 साल उम्र के युवा भरती हो सकते हैं। जिनकी योग्यता का मानदंड 10वीं पास के साथ शारिरिक रूप से स्वस्थ्य व मजबूत होना चाहिए। यानी 18 साल से कम उम्र के किशोरों से भी कौशल विकास के नाम पर काम कराने की क़ानूनन छूट मिल गई है। यही नहीं, काम करने के लिए बलिस्ट मुर्गा चाहिए!

बंधुआ बनाने वाला अनुबन्ध पत्र

नीम ट्रेनी कथित रूप से अनुबन्ध है। कम्पनियाँ कभी भी अनुबंध को समाप्त करने, मनमर्जी काम के घंटे तय करने, मनमाने नियम बनाने आदि के लिए स्वतंत्र हैं।

नीम के तहत भर्ती होने वाले प्रशिक्षु को एक शपथ पत्र और एक संविदा पत्र भरना होता है, जिसकी कई शर्तें बेहद खतरनाक हैं। श्रमिक की विफलता से यदि संविदा को समाप्त कर दिया जाता है तो प्रशिक्षण की लागत के बहाने कंपनी उससे पूरा पैसा वसूल सकती है। कम्पनी को वृतिका (स्टाइपेंड) मे भी कटौती का अधिकार है।

नीम ट्रेनी का फण्डा

  • कंपनियों सिर्फ ट्रेनिंग मुहैया कराने की जिम्मेदारी रखती हैं। बाकी सारा कार्यभार नीम एजेंट का होता है।
  • नीम एजेंट वह एजेंसी है जो कंपनी के एवज में सारी वैधानिक गतिविधियों का कार्यभार संभालती है। कंपनी को सिर्फ नीम एजेंट के मासिक बिल का भुगतान करना होता है।
  • यह स्कीम नीम एजेंट को सारे वैधानिक और संवैधानिक कार्यों के लिए कार्यरत रखती है। मतलब नीम ट्रेनिंग चलाने वाली कंपनी को कोई भी वैधानिक प्रतिक्रिया नहीं करनी है।
  • नीम ट्रेनी प्रक्षिक्षण खत्म होने के बाद कंपनी पर किसी भी तरीके का बोझ नहीं होता, उसको नौकरी पर रखना या ना रखना कंपनी निर्धारित करती है।
  • नीम स्कीम द्वारा निर्धारित ट्रेनिंग की अवधि 3 माह से 36 माह (3 साल) तक हो सकती है।
  • नीम स्कीम कंपनियों को कार्यकुशल श्रमिक प्रदान करता है जो कि उस कंपनी को लाभ पहुँचाते हैं।
  • सारी वैधानिक जिम्मेदारियां कंपनी की ना होकर नीम एजेंट की होती हैं।

कुल मिलाकर मालिक वर्ग जैसा अधिकार विहीन मज़दूर चाहता है, मोदी सरकार स्थाई रोजगार की जगह इसी प्रकार असुरक्षित रोजगार के फण्डों को क़ानूनी रूप दे चुकी है और दे रही है।

मज़दूर-मेहनतकश मन्दिर, राष्ट्र, कश्मीर आदि के नशे की खुराक़ लेकर मस्त है और उसकी गर्दन पर तलवारें तेजी से चल रही हैं!

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