कौन हैं ईयू सांसद, किसने बुलाया, कौन लाया?

ज्यादातर यूरोपियन संसद सदस्य इस्लामोफोबिया अति दक्षिण पंथी पार्टियों से जुड़े हैं

यूरोपीय संघ के नेताओं के 23 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के दो दिवसीय दौरे के दौरान कश्मीर में कई जगहों पर भारी विरोध प्रदर्शन हुआ। स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि इस दौरान वे दुकानें भी बंद रहीं जो दिन में कुछ समय के लिए खुलती थीं। घाटी के दो दिवसीय दौरे के अंतिम दिन यूरोपीय संघ के 23 सांसदों के शिष्टमंडल ने एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया और  कहा कि अनुच्छेद 370 भारत का आंतरिक मामला है और वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में वह देश के साथ खड़े हैं। इसके साथ जितने भी सांसदों ने वक्तव्य दिया सब भारत सरकार के इस कदम का आतंकवाद से लड़ने के नाम पर समर्थन करते हुए नजर आएं। ऐसा क्यों है इसे समझने के लिए इन सांसदों के पृष्ठभमि को समझते हैं।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल में ज्यादातर यूरोपियन संसद के सदस्य (एमईपी) शामिल हैं जो इस्लामोफोबिया और आप्रवासी-विरोधी छवि के साथ अति दक्षिण पंथी पार्टियों से जुड़े हैं।

इटली की डेमोक्रेटिक पार्टी के गुइसेप फेरनंदिना और यूके की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के बिल न्यूटन डन दो सदस्यों को छोड़कर अन्य सभी सदस्य यूरोप के विभिन्न देशों में दक्षिणपंथी या अति दक्षिण पंथी पार्टियों से जुड़े हैं। उदाहरण के लिए, फ्रांस के सभी 6 प्रतिनिधि मरीन ले पेन्स नेशनल रैली के हैं। नेशनल रैली ने अप्रवासियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाया था और यह मुस्लिम प्रवासियों को इस्लामी आतंकवादी बताता है।

स्पेन (वीओएक्स पार्टी) और इटली (लेगा नॉर्ड) से एक-एक प्रतिनिधि ऐसे दलों से संबंधित हैं जो आप्रवासी के मामले में एक तरह की भेदभावपूर्ण नीति का समर्थन करते हैं। वे खास तौर से मुस्लिम देशों से आप्रवासी का विरोध करते हैं लेकिन गैर-मुस्लिम देशों से आने वाले प्रवासियों को लेकर कोई विरोध नहीं करते हैं। यह नीति भारत में सत्तारूढ़ बीजेपी से बहुत हद तक मिलती-जुलती है जिसने मुसलमानों को छोड़कर दक्षिण एशियाई देशों से भारत आने वाले सभी प्रवासियों को नागरिकता देने के लिए संसद में एक विधेयक का प्रस्ताव रखा था।

23 प्रतिनिधियों में से अधिकांश ऐसे दलों से संबंधित हैं जो उन विचारधाराओं का पालन करते हैं जिन्हें आम तौर पर सांप्रदायिक-इस्लामोफोबिक के रूप में कहा जा सकता है।पोलैंड के 6 प्रतिनिधि लॉ एंड जस्टिस पार्टी से संबंधित हैं जो खुलेआम इस्लामोफोबिक और होमोफोबिक हैं और गर्भपात का विरोध भी किया है. यूके के पांच प्रतिनिधियों में से चार ब्रेक्सिट पार्टी के हैं और दो जर्मन प्रतिनिधि अल्टर्नेटिव फॉर जर्मनी पार्टी के हैं।

भारत सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद लगे प्रतिबन्ध के फैसले को कुछ विदेशी मीडिया घरानों ने काफी आलोचना की। हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस ने इस मुद्दे पर एक विशेष सुनवाई की। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने कश्मीर नीति को लेकर विदेशों में हुई आलोचनाओं को घरेलू मामलों में हस्तक्षेप करार दिया है और इस क्षेत्र में विदेशी प्रतिनिधियों और मीडिया के पहुंच से इनकार किया है। यहां तक कि भारतीय मीडिया को भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। इसलिए सबसे जरूरी सवाल उठता है कि दूसरे देश के सांसद  कैसे कश्मीर जा रहे है? कैसे उन्हें कश्मीर जाने की इजाजत दी जा रही है? जब अपने देश के विपक्षी दलों को वहाँ जाने की इजाजत नहीं दी गयी। 

इसका जवाब देने के लिए कहने वाले यह कह सकते हैं कि यह एक निजी और अनाधीकृत यात्रा है।  लेकिन जब यह निजी और अनधिकृत यात्रा है तब यह सवाल भी बनता है कि  इन सांसदों को भारत के प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी सम्बोधित क्यों कर रहे थे। इन यूरोपीय सांसदों को बुलाने के लिए इंटरनेशनल बिज़नेस ब्रोकर का कश्मीर से क्या लेना देना? भारत सरकार को कश्मीर के मामले में इंटरनेशनल ब्रोकर की ज़रूरत क्यों पड़ी? भारत आए यूरोपियन संघ के सांसदों को कश्मीर ले जाने की योजना जिस अज्ञात एनजीओ के ज़रिए तैयार हुई उसका नाम पता सब बाहर आ गया है। ये इंटरनेशनल बिज़नेस ब्रोकर है मादी शर्मा।

एनडीटीवी की रिपोर्ट कहती है ब्रिटेन के लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद क्रिस डेवीज़ को मादी शर्मा ने ईमेल किया।  सात अक्तूबर को भेजे गए ईमेल में मादी शर्मा कहती हैं कि वे यूरोप भर के दलों के एक प्रतिनिधिमंडल ले जाने का आयोजन का संचालन कर रही हैं। इस वीआईपी प्रतिनिधिमंडल की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात कराई जाएगी और अगले दिन कश्मीर का दौरा होगा। ईमेल में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात की तारीख़ 28 अक्तूबर है और कश्मीर जाने की तारीख़ 29 अक्तूबर है।  ज़ाहिर है ईमेल भेजने से पहले भारत के प्रधानमंत्री मोदी की सहमति ली गई होगी। तभी तो कोई तारीख़ और मुलाक़ात का वादा कर सकता ह। इसलिए मौलिक तौर पर यह कैसे कहा जा सकता है कि यह निजी और अनधिकृत  यात्रा है , जबकि इस यात्रा में भारत के प्रधानमंत्री शामिल है और उस राज्य का दौरा का शामिल है जहां पर तकरीबन 86 दिनों का प्रतिबन्ध लगा हुआ है। 

यह ईमेल कभी बाहर नहीं आता, अगर सांसद क्रिस डेवीज़ ने अपनी तरफ से शर्त न रखी होती। डेवीज़ ने मादी शर्मा को सहमति देते हुए लिखा कि वे कश्मीर में बग़ैर सुरक्षा घेरे के लोगों से बात करना चाहेंगे।  दस अक्तूबर को मादी शर्मा ने डेविस को लिखा कि बग़ैर सुरक्षा के संभव नहीं होगा क्योंकि वहाँ हथियारबंद दस्ता घूमता रहता है। यही नहीं अब और सांसदों को ले जाना मुमकिन नहीं। इस तरह डेविस का पत्ता कट जाता है। क्रिस डेवीज़ नार्थ वेस्ट ब्रिटेन से यूरोपियन संघ में सांसद हैं। उन्होंने कहा कि उनके क्षेत्र में कश्मीर के लोग रहते हैं जो अपने परिजनों से बात नहीं कर पा रहे। डेवीज़ ने मीडिया से कहा है कि वे मोदी सरकार के जनसंपर्क का हिस्सा नहीं होना चाहते कि कश्मीर में सब ठीक है। 

इन सांसदों द्वारा बुधवार को किये गए प्रेस कॉन्फ्रेंस से भी यह बात उजागर हुई कि ये सांसद भारत सरकार का कश्मीर के लिए गए फैसले का समर्थन कर रहे हैं। वैश्विक मामलों के जानकार प्रकाश के रे कहते हैं कि इन सांसदों का दौरा एक तरह का पीआर इवेंट है। यानी छवि चमकाने वाली बात है और जहां तक मादी शर्मा की बात है तो इस  कथा में मादी शर्मा उर्फ़ बिज़नेस ब्रोकर सिर्फ़ एक इवेंट मैनेजर है, प्यादा है। फ़ार राइट सांसदों का कश्मीर जाना ग्लोबल फ़ार राइट के आपसी कनेक्शन को बनाने की क़वायद है। यह पीआर स्टंट कम, पॉलिटिकल प्रोजेक्ट ज़्यादा है।

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