परमानेण्ट की जगह होगा फिक्स्ड टर्म इम्पलाइमेण्ट

रोजगार की नई किस्में-1 : स्थाई नौकरी ख़त्म

बदलते श्रमकानूनों के इस दौर में रोजगार की पूरी परिभाषा ही बदल गयी है। इसके लिए नये क़ानून बनाने की जगह पूर्ववर्ती कानूनों में मामूली संसोधनों के जरिए बड़ा बदलाव आ गया है। इनमे से एक बदलाव का नाम है ‘फिक्सड टर्म इम्प्लाईमेण्ट’। मोदी सरकार द्वारा स्थाई आदेश कानून में महज एक शब्द जोड़ा गया ‘फिक्स्ड टर्म’। यानी मालिकों को स्थाई रोजगार की जगह नियत अवधि के लिए काम पर रखने की खुली छूट। यही है मोदी सरकार का ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’।

फिक्सड टर्म : मनमाने रोजगार का नया धंधा

केंद्र सरकार ने औद्योगिक नियोजन (स्थाई आदेश) अधिनियम 1946, सपठित केन्द्रीय नियमावली में बदलाव करके ‘फिक्सड टर्म इम्प्लाईमेण्ट’ (नियत अवधि के लिए नियुक्ति का अनुबन्ध) का फण्डा दे दिया। इसी के साथ औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में संशोधन करके ‘फिक्स्ड टर्म’ का नया शब्द जोड़ दिया है। उसका मक़सद पहले से ही सीमित स्थाई रोजगा़र खत्म करके नियत अवधि के मज़दूर भर्ती करना है।

यानी, एक निश्चित अवधि के लिए नियोक्ता और कर्मकार के बीच में एक संविदा होगी और अवधि समाप्त होते ही उसको निकाल दिया जाएगा। वह अपने स्थायीकरण की भी माँग नही कर सकता। यह नया फंडा मालिकों को ’रखने व निकालने’ की खुली छूट देता है।

2016 में सीमित क्षेत्र के लिए बनने से शुरुआत

मोदी सरकार ने किस्तों में रोजगार के इस नये फण्डे की शुरूआत 2016 में नोटबन्दी के ठीक पहले सीमित क्षेत्रों के लिए किया था। अक्टूबर, 2016 में औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम में बदलाव के तहत ‘एपैरल मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर’ (गारमेण्ट एवं टेक्सटाइल्स उद्योग) में निश्चित अवधि के रोजगार की शुरुआत हुई थी।

इस प्रकार ‘फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट’ पर अनुबन्ध आधारित नियुक्ति करने की छूट पहले सिर्फ एपैरल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (वस्त्र निर्माण) के लिए हुई।

नोटबन्दी के प्रयोग से हौसले हुए बुलन्द

यह मोदी सरकार का एक ‘टेस्टिंग प्वाइंट’ था। एक तो यह पिछले दरवाजे से लागू हुआ था, जिसकी बहुतों को भनक भी नही लगी। दूसरे, उसी समय नोटबन्दी के शोर ने इसके शुरुआती विरोध को भी दबा दिया।

मोदी सरकार का लोगों को परखने और दूसरे मुद्दों में उलझाकर खेलने का एक और प्रयोग सफल हो गया। फिर तो उसने सभी क्षेत्रों के लिए ‘फिक्स्ड टर्म’ लागू कर दिया।

शब्दों की जादूगरी

इस संशोधन के लिए मोदी सरकार ने अधिसूचना जारी की। इसमें कहा गया है कि शब्द ’एपैरल मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में फिक्स्ड-टर्म इम्पलॉयमेंट’ को ’फिक्स्ड-टर्म इम्पलॉयमेंट’ के साथ बदला जाएगा। यह शब्दों का खेल था। कुछ शब्दों की हेरा-फेरी से, बगैर मूल क़ानून को बदले बहुत कुछ बदलने की संघ-भाजपा की महारथ यहाँ भी काम आई।

शब्दों की इस जादूगरी हुआ यह कि सभी सेक्टरों के लिए यह व्यवस्था बन गयी। इस तरह मनमानी अवधि के लिए अनुबन्ध पर नियुक्ति की छूट सभी उद्योगों और क्षेत्रों में लागू हो गयी।

सीमित अवधि की अनुबन्ध आधारित नियुक्ति

परिभाषा के मुताबिक, कोई कर्मचारी अगर एक तय समय के लिए अनुबन्ध के आधार पर नियुक्त किया जाए तो उसे ‘फिक्स्ड टर्म एंप्लॉयमेंट’ कहा जाएगा। इस लिहाज से नियोक्ता और संबंधित कर्मचारी के बीच अनुबन्ध नवीनीकरण न होने पर कर्मचारी की सेवाएं खुद-ब-खुद खत्म मान ली जाएंगी।

वैसे तो लिखा यह भी है कि वेतन व सुविधाएं स्थाई कर्मकार की भाँति मिलेंगी, लेकिन अब तो कंपनियां सालाना पैकेज तय कर रही हैं, जो कंपनी कास्ट (सीटीसी) आधारित होता है। यानी हाथ में आने वाला वेतन काफी कम होता है। तो क्या मिलेगा साफ है!

सच यह है कि जब तमाम कम्पनियों में, जहाँ यूनियन नहीं हैं, स्थाई श्रमिकों को डबल ओवर टाइम और निर्धारित छुट्टियाँ तक नहीं मिल रही हैं, तो फिर अनुबन्धित श्रमिकों को क्या लाभ मिलेगा, समझना आसान है।

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स्थाई नौकरी हो जाएगी खत्म

देखने की बात यह है कि श्रम क़ानूनों में कर्मकारों का जो वर्गीकरण है, अभी वे सभी मौजूद हैं, केवल ‘फिक्स्ड टर्म’ शब्द जोड़ा गया है। लेकिन इसका सीधा मतलब है कि कम्पनियां सीमित अवधि के अनुबन्ध पर ही नियोजन करेंगी। यह ठीक उसी प्रकार होगा, जैसे कर्मकार की परिभाषा में कैजुअल है, लेकिन उसका स्थान ठेका श्रमिक ने लिया। यह कब हो गया, किसी को पता भी नहीं चला।

यह ध्यानतलब है कि यह उन्हीं की माँग पर संशोधित हुई है।

वैसे, तमाम कंपनियां अवैध रूप से पहले से ही फिक्सड टर्म का धंधा चला रही थीं, लेकिन अब उसे कानूनी रूप भी मिल गया है।

यही है मोदी सरकार का ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ यानी व्यापार को आसान बनाने का फण्डा !

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