बचाओ-बचाओ की घिसी-पिटी चीख पुकार

सिर्फ एक रेडिकल परिवर्तन का कार्यक्रम ही तब्दीली की उम्मीद जगा सकता है

जनता के एक बड़े हिस्से पर से मोदिया विकास, अच्छे दिन और राष्ट्रवाद का भ्रमजाल तो टूट रहा है, पर जिस राजनीति से बुरी तरह हताश-निराश होकर वह इस भ्रमजाल में फँसे थे, उस पर भी वापस भरोसा करने की कोई वजह उन्हें नजर नहीं आ रही।

जनतंत्र बचाओ, धर्मनिरपेक्षता बचाओ, संविधान बचाओ, ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ बचाओ, आरक्षण बचाओ, किसानों को बचाओ, व्यापारियों को बचाओ, गाँवों को बचाओ, हिंदी बचाओ, उर्दू बचाओ, वगैरह वगैरह के प्रतीकात्मक नारे अब भरोसा नहीं जगाते क्योंकि इनकी आड़ में ही तो दशकों तक पुराने राजनीतिक गिरोहबाजों, ठेकेदारों, उनके कुनबियों और लग्गू-भग्गुओं के स्वार्थ पूरे होते रहे।

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ये ‘बचाओ-बचाओ’ वाले राजनीतिक नारे मेहनतकश जनता की अब तक की दुर्दशा भरी ज़िंदगी को बचाने का पर्याय बन चुके हैं। ऐसे में तमाम मोहभंग के बावजूद भी अपनी सांगठनिक ताकत और धनशक्ति के बल पर फासिस्ट बीजेपी चुनाव जीतने या सरकारें बना लेने में बहुत हद सफल होती ही रहेगी।

सिर्फ एक रेडिकल परिवर्तन का कार्यक्रम ही तब्दीली की वह उम्मीद जगा सकता है जो फासीवादी गिरोह से लड़ने के लिए जरूरी है।
इसके लिए सवाल आरक्षण बचाओ तक सीमित नहीं हो सकता, करोड़ों मेहनतकश दलित-आदिवासी जनता को समान व मर्यादापूर्ण शिक्षा-रोजगार कैसे मिले वह कार्यक्रम चाहिये।

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इसके लिए नारा धार्मिक ठेकेदारों-वोटबैंक वाली ‘धर्मनिरपेक्षता’ बचाओ नहीं हो सकता, बल्कि धर्म को सही माने में निजी मसला बनाकर सार्वजनिक जीवन में धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग, भाषा के भेदभाव रहित समानता वाला समाज का कार्यक्रम हो सकता है।
इसके लिए मुद्दा संविधान बचाओ नहीं हो सकता, आर्थिक-सामाजिक शोषण से रहित नई समाज व्यवस्था कैसे बने वह कार्यक्रम हो सकता है।

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इस वास्ते पुराने ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को बचाने का नारा कोई नई ऊर्जा पैदा नहीं करता क्योंकि उस ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ में देश की अधिकांश मेहनतकश जनता की ज़िंदगी तो शोषण और जुल्म से भरी हुई थी। इस वास्ते तो उस शोषण-जुल्म से मुक्ति वाला आइडिया ऑफ इंडिया गढ़ना पड़ेगा।

जो राजनीतिक शक्ति ऐसा जड़मूल परिवर्तन वाला ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ गढ़ और पेश कर सकेगी वही मेहनतकश जनता में उस उम्मीद और ऊर्जा का संचार कर पाएगी जो उसे वास्तविक संघर्ष में उतरने के लिए प्रेरित कर सके।

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इस बचाओ-बचाओ की घिसी-पिटी चीख पुकार वाली प्रतीकात्मक राजनीति को छोड़ नई सामाजिक व्यवस्था का रेडिकल कार्यक्रम गढ़ने-पेश करने से ही वामपंथी राजनीति जनता के सामने उम्मीदें जगाने लायक वास्तविक विकल्प बन कर उभर सकती है।

मुकेश असीम का फेसबुक पोस्ट साभार

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