उत्तराखंड आयुर्वेद छात्र-छात्राओं पर पुलिसिया दमन

आयुर्वेद पढ़ने वालों के अभिभावकों की जेबें काटने और छात्र-छात्राओं को पुलिसिया लात-घूसों से पिटवा कर बनेगा आयुष प्रदेश?

19 अक्टूबर की शाम को देहारादून के परेड ग्राउंड स्थित धरना स्थल पर पुलिस ने एकाएक धावा बोल दिया। वहाँ बीते कई दिनों से विभिन्न आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का धरना और आमरण अनशन चल रहा था। पुलिस का निशाना इन्हीं छात्र-छात्राओं का तम्बू था। घोषित तौर पर उद्देश्य था लगभग 7-8 दिन से आमरण अनशन पर बैठे एक छात्र को उठाना। लेकिन छात्र-छात्राओं का कहना है कि पुलिस ने उन पर लात-घूंसों से प्रहार किया।

सवाल यह कि पुलिस अनशन कर रहे छात्र का जीवन संकट में न पड़ने देने के लिए गयी थी या फिर अनशनकारी के अलावा बाकी छात्र-छात्राओं को भी अस्पताल पहुंचा देने के लिए?  अनशनकारिओं को उठाने के लिए उसके बाकी साथियों को लात-घूसों से घायल कर देने का तरीका आईपीसी या सीआरपीसी की कौन सी धारा में तजवीज़ किया गया है, ये भी मित्र पुलिस बता देती तो हमारा भी ज्ञान वर्द्धन होता!

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पहला सवाल तो यह कि प्रदेश के विभिन्न प्राइवेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों के छात्र-छात्राएँ धरना-प्रदर्शन कर क्यूँ रहे हैं?

दरअसल इन छात्र- छात्राओं का मामला उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व में चलने वाली डबल इंजन की सरकार द्वारा नियम-कायदों की खुली धज्जियां उड़ाए जाने का मामला है, जिसकी बुनियाद उनके पूर्ववर्ती हरीश रावत के जमाने में रखी गयी थी।

किस्सा शुरू यूं होता है कि 14 अक्टूबर 2015 को यानि हरीश रावत के मुख्यमंत्रित्व काल में तत्कालीन प्रमुख सचिव ओमप्रकाश द्वारा एक शासनादेश जारी करके निजी आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में बी.ए.एम.एस. की फीस 80 हजार रुपये प्रतिवर्ष तथा छात्रावास शुल्क 18 हजार रुपये को बढ़ा कर 2 लाख 15 हजार रुपया प्रतिवर्ष कर दिया जाता है। बी.एच.एम.एस. पाठ्यक्रम के लिए यह फीस 73 हजार 600 रुपया प्रतिवर्ष तथा छात्रावास शुल्क 18 हजार रुपये से  बढ़ा कर 1 लाख 10 हजार रुपया प्रति वर्ष कर दी गयी। बढ़ी हुई फीस नए छात्र-छात्राओं से ही नहीं पहले से पढ़ रहे छात्र-छात्राओं से भी वसूली जाने लगी।

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मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के अत्यंत प्रिय अफसर, तत्कालीन प्रमुख सचिव और वर्तमान में अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश का फीस वृद्धि संबंधी उक्त आदेश पूरी तरह अवैधानिक था। 2004 में पी.ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र सरकार के मुकदमे में उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया था कि प्राइवेट कॉलेजों की फीस निर्धारण के लिए राज्य स्तर पर विशेषज्ञ कमेटी गठित की जाये। उक्त आदेश के अनुपालन में उत्तराखंड सरकार द्वारा “उत्तरांचल अनएडेड प्राइवेट प्रोफेशनल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (रेग्युलेशन एंड फ़िक्सेशन ऑफ फी) अधिनियम,2006”  पारित किया गया। उक्त अधिनियम के अनुसार निजी संस्थानों में शुल्क निर्धारण, उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली कमेटी द्वारा किया जाएगा। जहां 2006 में पारित उक्त अधिनियम में शुल्क निर्धारण कमेटी के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नामित करने का अधिकार उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दिया गया था, वहीं 2010 में राज्य में बनी भाजपा की सरकार ने उक्त अधिनियम में संशोधन करके शुल्क निर्धारण कमेटी के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नामित करने का अधिकार सरकार के हाथ में यानि स्वयं के हाथ में ले लिया।

फिर भी शुल्क वृद्धि का अधिकार वैधानिक रूप से उक्त कमेटी को ही है। परंतु वर्तमान सरकार के अत्यंत चहेते अफसर ने पिछली सरकार के कार्यकाल में नियम -कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए स्वयं ही शुल्क वृद्धि का ऐलान कर दिया। इस शुल्क वृद्धि के खिलाफ बी.ए.एम.एस. के  2013-14, 2014-15 तथा 2015-16 बैच के 5 छात्रों ने उच्च न्यायालय, नैनीताल में जनहित याचिका दाखिल की।

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उत्तराखंड सरकार ने न्यायालय में तर्क दिया कि उक्त शुल्क वृद्धि इसलिए जायज है क्यूंकि यह 7 साल बाद की गयी है। जुलाई 2018 में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने राज्य सरकार के तर्क को खारिज  करते हुए फीस वृद्धि के राज्य सरकार के आदेश को अरक्षणीय करार देते हुए रद्द कर दिया। एकल पीठ ने यह भी आदेश दिया कि यदि किसी कॉलेज ने छात्र-छात्राओं से बढ़ी हुई फीस ली है तो न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने के 2 हफ्ते के भीतर वह वसूली गयी धनराशि लौटा दे।

उच्च न्यायालय की एकल पीठ के फैसले के खिलाफ प्राइवेट आयुर्वेदिक कॉलेजों की एसोसिएशन ने डबल बेंच में अपील की। डबल बेंच ने 9 अक्टूबर 2018 को सुनाये गए अपने फैसले में कहा कि फीस बढ़ाने का राज्य सरकार का निर्णय उत्तरांचल अनएडेड प्राइवेट प्रोफेशनल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (रेग्युलेशन एंड फ़िक्सेशन ऑफ फी) अधिनियम,2006 और उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित कानून का उल्लंघन है। साथ ही डबल बेंच ने एकल पीठ के फैसले को सही करार दिया।

उच्च न्यायालय के उक्त दो आदेशों के बाद क्या होना चाहिए था? राज्य सरकार के लिए यह बाध्यकारी था कि वह उच्च न्यायालय के उक्त आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित कराती, जो पुलिस धरने पर बैठे हुए छात्र-छात्राओं के तम्बू पर धावा बोलने के लिए भेजी गयी, गृह विभाग का जिम्मा संभालने वाले मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत को उस पुलिस को प्राइवेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज के संचालकों के ठिकाने पर भेजना चाहिए था कि विकल्प चुन लो, फीस वापस लौटाओगे या जेल जाओगे। परंतु त्रिवेन्द्र रावत सरकार में यह परिपाटी बन गयी है कि उच्च न्यायालय का जो आदेश सरकार को अपने मुफीद नहीं लगता, उसकी खुली अवहेलना की जाती है।

उच्च न्यायालय के दो आदेशों के बावजूद छात्र-छात्राओं पर बढ़ी फीस देने के लिए निरंतर दबाव बनाया जा रहा है। बढ़ी फीस न देने वाले छात्र-छात्राओं को तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। क्लास में बैठने से रोके जाने से लेकर हॉस्टल से निकालने की धमकियों तक, निरंतर उत्पीड़न किया गया। थ्योरी में पास छात्र को प्रैक्टिकल में फेल कर दिया गया।

इसके खिलाफ इन छात्र-छात्राओं ने उत्तराखंड आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर देहारादून के जिलाधिकारी तक से शिकायत की। पर जहां उच्च न्यायालय का निर्णय नहीं माना जा रहा, वहाँ बाकी किसी की क्या बिसात!

ये प्राइवेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज वाले किस कदर छुट्टे और नियंत्रण मुक्त हैं, इसकी एक और बानगी देखिये।

उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन के संबंध में उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा 05 अक्टूबर 2019 को प्राइवेट आयुर्वेदिक/होमियोपैथी/यूनानी मेडिकल कॉलेजों की बैठक बुलाई गयी। 16 सम्बद्ध कॉलेजों में से केवल 06 कॉलेजों के प्रतिनिधि ही बैठक में उपस्थित हुए। जब आयुर्वेद  विश्वविद्यालय ने उक्त उपास्थित 06 कॉलेजों के प्रतिनिधियों से फीस के मामले में हाई कोर्ट के आदेश का अनुपालन करने संबंधी पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा तो 06 में से 03 ने बहाना बनाते हुए हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। यह खुले तौर पर ऐलान है कि शुल्क वृद्धि के संबंध में हाई कोर्ट के आदेश को ये प्राइवेट कॉलेज नहीं मानेंगे।

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पर इस कदर ढीठता का राज क्या है? जानकारों का कहना है कि ये प्राइवेट आयुर्वेदिक कॉलेज सत्ता के निकटस्थ बड़े लोगों के हैं। सत्ता के लिए “यहाँ-वहाँ-जहां-तहां, मत पूछो कहाँ-कहाँ” जाने वाले नेता जी से ले कर “चिफली गिच्ची” वाले नेता जी और व्यापारी बाबा तक सबकी हिस्सेदारी बताई जा रही है, इन प्राइवेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में। इसलिए हाई कोर्ट के आदेश की खुली अवमानना करने में इन्हें तनिक भी भय नहीं हो रहा है।

आज जो सरकार सत्ता में है,वह अपने आप को आयुर्वेद के बड़े हितैषी के रूप में प्रस्तुत करती है। भाजपा के ही राज में उत्तराखंड को आयुष प्रदेश बनाने का नारा भी उछाला गया। ये नारा उछालने वाले निशंक जी और मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत जी, क्या आयुर्वेद पढ़ने वालों के अभिभावकों की जेबें काटने और इन छात्र-छात्राओं को पुलिसिया लात-घूसों से पिटवा कर बनेगा आयुष प्रदेश?

-इन्द्रेश मैखुरी का पोस्ट साभार

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