रेलवे से 3 लाख कर्मचारियों की होगी छँटनी

प्रचंड बहुमत प्रचंड हमला, अब रेलवे के काम होंगे आउटसोर्सिंग द्वारा

देश के सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर उद्योग रेलवे को पूरी तरीके से कारपोरेट कंपनियों के हाथों में देने के क्रम में रेलवे के निगमीकरण/निजीकरण और निजी हाथों ट्रेन संचालन के साथ अब रेलवे के कई काम आउटसोर्सिंग यानी कि ठेके पर दूसरी कंपनियों से करने का फरमान जारी हो गया है। यही नहीं रेलवे ने 3 लाख कर्मचारियों की छँटनी का लक्ष्य रखा है।

मोदी-2 सरकार निजिकरण करने पर आक्रामक

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत होते ही रेलवे के सभी सात कोच, इंजन व वैगन बनाने वाले कारखानों को एक झटके में निगम में तब्दील कर दिया और निजीकरण की ओर तेजी से बढ़ते हुए कारपोरेट को सौंपने की घोषणा कर दी।

नई सरकार ने अपने पहले बजट में भी उसे गति दी। ट्रेनों को निजी क्षेत्र में देने से शुरुआत करते हुए तमाम ट्रेनों, स्टेशनों के साफ-सफाई, कैटरिंग और अन्य कामों को निजी हाथों में देने प्रक्रिया को तेज कर दिया।

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जबरिया अवकाश योजना

लाराकर ने मार्च 2020 तक 55 वर्ष से अधिक उम्र अथवा 30 साल से अधिक सेवा पूरी करने वाले रेलवे कर्मचारियों की छँटनी का भी फरमान जारी करते हुए उसे तेजी से लागू करना शुरू कर दिया। और अब कई काम आउटसोर्स से कराने का बंदोबस्त भी कर दिया।

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आउटसोर्स से होंगे कई काम

नए फरमान के तहत ओएचई (ओवरहेड इक्विपमेंट) नान पावर ब्लॉक व इसके अन्य कार्य, पीएसआई (पावर सप्लाई इंस्टॉलेशन) मेंटेनेंस एवं पीयसआई ऑपरेशन तथा टीपीसी (ट्रैक्शन पावर कंट्रोलर), ड्राइंग तथा तकनीकी एवं क्लर्कीयल स्टाफ व हेल्पर के कार्य आदि आउटसोर्स से कराने के लिए कहा गया है।

इसके लिए रेलवे बोर्ड ने रेलवे जोन के महाप्रबंधकों को इसकी रूपरेखा तैयार करने के निर्देश जारी किए हैं।

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यही नहीं बोर्ड ने और गतिविधियों में भी नए मानकों के अनुसार इलेक्ट्रिक लोको तथा कोच के मेंटेनेंस के लिए इलेक्ट्रिक एवं मैकेनिकल कर्मचारियों की संख्या को घटाने के भी निर्देश दिए हैं।

यह गौरतलब है कि रेलवे पर संसद की स्थाई समिति को रेल मंत्रालय ने कहा है कि उसका इरादा सभी ख़ाली पदों को भरने का नहीं है। वह अपने मुख्य कार्य के लिए पदों को भरेगी मगर बाकी काम के लिए आउटसोर्सिंग जैसा विकल्प देख रही है। यानी बहुत सारे पद ठेके पर दिए जाने हैं।

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भाजपा सरकारों द्वारा छँटनी की गति तेज

रेलवे की यह मुहिम मोदी सरकार के उस आदेश के बाद शुरू हुई है जिसमें सभी मंत्रालयों से कथित रूप से फालतू कर्मचारियों में कमी करने तथा गैर-कोर गतिविधियों को आउटसोर्स से कराने के लिए कहा गया है।

इस दिशा में केंद्र सरकार के अन्य विभागों तथा भाजपा शासित कई राज्य सरकारों ने भी कदम उठाते हुए जबरिया रिटायरमेंट देने में तेजी ला दी है।

रेलवे में 3 लाख कर्मचारी कम करने का लक्ष्य

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों मोदी सरकार की ओर से एक प्रश्न के जवाब में लोकसभा में कहा गया था कि रेलवे में 13 लाख कर्मचारी हैं और सरकार उनकी संख्या घटाकर 10 लाख करना चाहती है।

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सरकार के आदेश के बाद ग्रुप ए व ग्रुप बी के 1.19 लाख अधिकारियों के कामकाज को आधार बनाया गया है। जबकि उसके नीचे के कर्मचारियों को आउटसोर्स से कार्य के बहाने निकाले जाने का कार्य शुरू हो गया है।

ज्ञात हो कि देश का सबसे बड़ा पब्लिक सेक्टर इकाई रेलवे है, जहाँ एक वक्त में 21 लाख से ज्यादा कर्मचारी कार्य करते थे। आज रेलवे का नेटवर्क पहले से काफी बढ़ा हुआ है, ट्रेनों की संख्या भी काफी अधिक हुई है, इसके बावजूद कर्मचारियों की संख्या घटाने पर सरकार आमादा है।

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कर्मचारियों की छँटनी से घाटे से उबारने का तर्क

मोदी सरकार लगातार या हास्यास्पद तर्क दे रही है कि वह देश की अर्थव्यवस्था को घाटे से उबारने और मजबूत करने के लिए वेतन व अन्य खर्चों में कटौती करना चाहती है।

कारपोरेट का कर्ज ब्याज सहित उतारने का काम

दरअसल, कारपोरेट जगत ने भारी पैमाने पर रुपयों की बारिश करके मोदी नीत भाजपा सरकार को सत्ता में बैठाया है। उनकी अपेक्षाओं को मोदी-1 सरकार ने भी पूरा किया था। और अब मोदी-2 सरकार पूँजीपतियों का वह कर्ज ब्याज सहित उतारने में जुटी हुई है।

यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि मोदी सरकार मजदूरों-कर्मचारियों के जिस तबके का गर्दन काट रही है, वही उस की जय जयकार में लगी हुई है।

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देश के हालात लगातार बेहद खराब बने हुए हैं, अमीरी-गरीबी की खाई बेइंतहा बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी, मँहगाई लगातार नित नए रिकॉर्ड बना रहे हैं, जनता के खून-पसीने से खड़े सार्वजनिक कम्पनियाँ मुनाफाखोरों के हवाले तेजी से होने लगी हैं, लेकिन फिर भी सब जगह एक सन्नाटा छाया हुआ है…

तय है कि इन भयावह हालात में जल्द ही हिन्दू मुस्लिम विवाद के नए नए संस्करण लाँच किए जाने वाले हैं, समान नागरिकता और एनआरसी का मुद्दा उछल चुका है, ताकि बेरोज़गारी, मंदी या कार्पोरेट लुट का सवाल गायब हो जाए और मंदिर निर्माण या दूसरे-तीसरे मुद्दों के सपने में लोग खो जाएं और कार्पोरेट लूट बदस्तूर गति पकड़ता रहे।

इसलिए जोर से बोलो- जय जय जय श्री राम!

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