पहले डूब, अब भूकंप: सरदार सरोवर के विस्थापितों पर दोहरी मार- ग्राउंड रिपोर्ट

16 हजार घर कागजों में डूब क्षेत्र से बाहर, लेकिन डूबने को तैयार

बीता पखवाड़ा मध्यप्रदेश के धार ज़िले में रहने वाली चेतना सिंह के लिए एक बुरे सपने की तरह रहा है.

नर्मदा किनारे बसे एकलवारा गांव में रहनी वालीं चेतना का घर सरदार सरोवर बांध के बैकवॉटरस के पानी से धीरे-धीरे टूटता जा रहा है.

अपनी रसोई के पिछले दरवाज़े से नीचे जाती सीढ़ियों की ओर इशारा करते हुए वह कहती हैं, “उस रात सोने से पहले हमने देखा कि बांध का पानी हमारे घर के एकदम पास तक आ गया है. आधी रात तक हम चिंता में पड़े रहे. मैंने किचन के दरवाज़े के पास का सामान भी ख़ाली कर दिया.”

“फिर किसी तरह डर के साये में हमें थोड़ी देर के लिए नींद आई. सुबह जब पाँच बजे मेरी आँख खुली और मैंने किचन के पीछे वाला दरवाज़ा खोला तो देखा कि पानी मेरे पैरों तक आ चुका है. सारी सीढ़ियाँ डूब चुकी हैं. यह देखते ही मैं घबरा गई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी. मेरी पड़ोसी भी सामने अपने डूबे हुए घर में खड़ी थी. मुझे देखकर वो भी रोने लगीं.”

सुबह पाँच बजे अपने डूबते घरों में खड़ी दो महिलाओं के रोने का यह दृश्य आज के निमाड़ की एक चुभती हुई तस्वीर बयां करता है.

नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध में 138 मीटर की ऊँचाई तक पानी भरे जाने के बाद से डूब क्षेत्र में आए यहां के 178 गांव, हर रोज़ बांध के बैकवॉटर्स में समाते जा रहे हैं.

काग़ज़ी और असल ज़िंदगी में आबाद से बेघर हो जाने जितना फ़र्क़ है. ये बात एकलवारा गांव के निवासियों से बेहतर, भला कौन समझेगा?

लगभग 2000 से ज़्यादा की जनसंख्या और पशु-पक्षियों की एक भरी-पूरी आबादी वाला एकलवारा गांव, सरकारी दस्तावेज़ों में सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र से बाहर आता है.

लेकिन, असलियत में आज चारों तरफ़ से बांध के पीछे ठहरे हुए पानी से घिर चुका ये गांव हर रोज़ धीरे-धीरे मरता जा रहा है.

यहां अपने पुश्तैनी घर में परिजनों के साथ रहने वालीं चेतना सिंह का परिवार नर्मदा घाटी के उन 15,946 परिवारों में शामिल हैं जिन्हें 2008 में एक रिवायज़्ड बैक वॉटर लेवल के आधार पर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण या एनवीडीए ने डूब क्षेत्र से बाहर बताया था.

चेतना के पति भरत किसान हैं. घर की ढहती दीवारों की ओर इशारा करते हुए वह कहते हैं, “सरकार कहती है कि हमारा घर डूब से बाहर है. एनवीडीए के अधिकारियों ने एक चिट्ठी दी जिसमें लिखा था कि हमारे घर डूब से बाहर रहेंगे. इसलिए हम निश्चिन्त बैठे थे. लेकिन, देखिए पानी हमारे घर तक आ चुका है और दीवार टूट गई है.”

मुआवज़े के नाम पर भरत को कुछ नहीं मिला है. घर के एक साबुत हिस्से में बैठ कर बात करते हुए वह कहते हैं, “सरकार तो आज भी यही बता रही है कि उन्होंने सबको मुआवज़ा दे दिया है और सबको पुनर्वास स्थल पर बसा दिया गया है लेकिन हमें अभी तक ज़मीन मिलना बाक़ी है.”

“सरकार बोल रही है कि 5 लाख 80 हज़ार का पैकेज दिया गया है, लेकिन हमको तो नहीं मिला. गवर्नमेंट ने बोला कि आपका गांव डूब से बाहर है. इसलिए हम चुप-चाप बैठ गए. लेकिन बांध में पानी का स्तर 136 मीटर तक जाते ही मेरे घर में चारों तरफ़ पानी भर गया. एनसीए (नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी) वाले बोल रहे हैं कि प्लॉट दे दिया, लेकिन कहाँ मिला है प्लॉट? हमारे परिवार को तो नहीं मिला.”.

किसी भी आम किसान परिवार की तरह, चेतना और भरत भी घर के साथ बने बाड़े में उनके साथ रहने वाले 12 पशुओं को भी अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं.

चेतना ये सोच-सोच कर परेशान हैं कि अगर 18 कमरों वाले उनके पुश्तैनी घर के मुआवज़े में उन्हें सरकार ने विस्थापितों के लिए तय प्लॉट दे भी दिया तो 22 लोगों का उनका परिवार वहां कैसे रह पाएगा.

अपने बच्चों को याद करते हुए वह कहती हैं, ” इस घर से मेरी बहुत-सी यादें जुड़ी हैं. बच्चे फ़ोन करके पूछते हैं कि दशहरा दिवाली में कहाँ आएँ तो बहुत बुरा लगता है. कहाँ बुलाऊँ उन्हें? घर तो पूरा टूट चुका है.”

भरत की ही तरह एकलवारा में सात पुश्तों से रहने वाले देव सिंह का पुश्तैनी घर अब उनके खलिहान, बचपन के स्कूल और एक पूरे जीवन की यादों को अपने साथ लिए, बांध के पानी में समाता जा रहा है. लेकिन नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण या एनवीडीए ने अपने रिकॉर्ड्स में उनके घर को भी डूब क्षेत्र से बाहर बताया है.

क़ानूनी रूप से डूब में शामिल होने और ना होने के बीच उलझे देव सिंह अपने ही गांव में नाव से घूमते हुए उदास हो जाते हैं. अपने डूब चुके स्कूल के सामने से गुज़रते हुए वह कहते हैं, “आज का यह जो जलभराव सरदार सरोवर बांध में हुआ है इससे सभी कुछ तहस-नहस हो चुका है.”

“मकानों में दरारें आ गई हैं, आधा-आधा हिस्सा डूब गया है. मुआवज़े की स्थिति यह है कि वर्तमान सरकार ने अभी-अभी सर्वे का काम दोबारा चालू किया है. आख़िर में जब 138 मीटर तक आते ही पानी पूरे गांव में फैलने लगा, तब जाकर उन्होंने माना कि अब तो पूरे गांव को ही डूब में लेना पड़ेगा. लेकिन इसके पहले तक तो अधिकारी सिर्फ़ यही कहते रहे…आप डूब से बाहर हैं, आप डूब से बाहर हैं.”

नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ीं सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का मानना है कि सरदार सरोवर बांध को फ़ुल रिज़रवेयर लेवल तक भरते ही 15946 परिवारों को डूब से बाहर बताने वाली राज्य सरकार की पोल खुल गयी है.

बड़वानी स्थित आंदोलन के कार्यालय में बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, “पहले तो कोई आँकड़ा ही सामने नहीं आया. किसी भी परिवार को यह बताने के लिए कोई आधिकारिक चिट्ठी नहीं दी गयी थी कि वो अब डूब से बाहर हैं. लेकिन, उनमें से जो-जो लोग शिकायत निवारण प्राधिकरण में अपना हक़ मांगने के लिए जाते, उनको एनवीडीए जवाब देती कि अब आप डूब से बाहर हैं इसलिए आपको पुनर्वास का कोई लाभ नहीं मिलेगा. लोगों को ये बात समझ ही नहीं आ पाती क्योंकि उनके घर तो पानी में डूब चुके थे”.

“फिर हम लोग आवाज़ उठाते रहे कि या तो आप लोगों को उनकी ज़मीन वापस करें या उन्हें मुआवज़ा दें. तब अचानक 2016 में, उन्होंने जो फ़ैक्टशीट सुप्रीम कोर्ट में जमा की, उसमें लिखा हुआ था कि नए बैकवॉटर लेवल के आधार पर डूब प्रभावित गांवों की संख्या 192 से घटकर 176 पर आ गयी है. इस तरह उन्होंने डूब परिवारों की संख्या को भी कम दिखाते हुए 15946 परिवारों को डूब से बाहर घोषित कर दिया.”

इधर एकलवारा में महसूस किए जा रहे भूकम्प के झटकों से भरत और चेतना के डूबते घर में दरारें पड़ने लगी हैं. लेकिन, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के भूवैज्ञानिक अक्षय कुमार जोशी इन झटकों को घाटी में मानसून के दौरान आने वाली सेसमिक हलचल बता रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, “नौ अगस्त 2019 से यहां पर ट्रेमर चल रहे हैं, यह झटके आम तौर पर मानसून के दो महीने तक चलते हैं. इन झटकों का मैग्नीट्यूड रिक्टर स्केल पर तीन के अंदर ही है. इसलिए किसी बड़े भूकंप का ख़तरा बहुत कम है.”

लेकिन लंबे समय से नर्मदा घाटी पर काम कर रहे स्वतंत्र भूवैज्ञानिक डॉक्टर राम श्रीवास्तव की मानें तो सरदार सरोवर बांध को फ़ुल रेज़रवोर लेवल तक भरना इन झटकों का कारण है.

इंदौर के अपने दफ़्तर में उन्होंने कहा, “1980 में हुआ शोध यह बताता है कि होशंगाबाद से लेकर सरदार सरोवर बांध तक नर्मदा घाटी में वर्टिकल फ़ॉल्ट्स हैं, यानी घाटी भीतर से पोली है. इसलिए यहां बांध बनाने या उनमें पानी भरने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए. यह भूकम्प संभावित ज़ोन है. इसलिए अगर आप यहां इतने बड़े बांध में पानी भरेंगे तो धमाका होगा ही. अब अगर घाटी की धरती कांप रही है और लोग घरों में दरारों की शिकायत कर रहे हैं तो यह किसी बड़े भूकंप का संकेत हो सकता है. इसके लिए सरकार को तैयार रहना चाहिए.”

इन मुद्दों पर जब हमने सरकार का पक्ष जानना चाहा तो भोपाल के वल्लभ भवन में बैठने वाले सम्बंधित उच्च अधिकारियों ने समय देने के बाद, ऑन-रिकॉर्ड बात करने से इनकार कर दिया. लेकिन, नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने विस्थापन के अधिकारों से वंचित परिवारों की त्रासदी के साथ-साथ घाटी में भूकंप की आशंका को भी स्वीकर किया.

“नया बैकवॉटर लेवल नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी की निगरानी में तय किया गया था. ज़्यादातर जगह वह ठीक रहा लेकिन कुछ जगहों पर डूब का अनुमान ग़लत निकला है. ऐसे सभी प्रभावित परिवारों का दोबारा सर्वे कर मुआवज़ा दिया जाएगा. भूकम्प की शिकायतों की जाँच के लिए एक टीम गठित कर रहे हैं”. – मध्य प्रदेश प्रशासन

आज चार दशक बाद भी सरकार सर्वे और जाँच टीमों के पुराने नासूर में उलझी हुई है जबकि बांध का पानी लोगों के घरों के साथ-साथ जैसे उनकी आँखों में भी हमेशा के लिए भर चुका है.

( प्रियंका दुबे, बीबीसी संवाददाता, मध्य प्रदेश से लौटकर, बीबीसी न्यूज से साभार )

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