मोदी सरकार ले चुकी है ऑर्डिनेंस फैक्टरियों के निगमीकरण का फैसला

संचालन, स्टाफ, उत्पादन और ब्रिकी को लेकर 30 सितंबर को होगी उच्चाधिकारियों की बैठक

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, रक्षा मंत्रालय देश भर में 41 ऑर्डनेंट फैक्ट्रियों के निगमीकरण का फैसला ले चुकी है। 30 सितंबर यानी सोमवार को उच्चस्तरीय कमेटी ने वार्ता के लिए फेडरेशनों को आमंत्रित किया है लेकिन इसमें सिर्फ इस पर बात होगी कि निगमीकरण के बाद इन फैक्ट्रियों को कैसे चलाया जाए।

जबकि दूसरी तरफ सरकार की मंशा भांप कर इंडियन नेशनल डिफेंस वर्कर्स फेडरेशन ने सोमवार को 11 बजे से संसद मार्ग पर धरना प्रदर्शन का आह्वान किया है। उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से ट्रेड यूनियन नेताओं ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा है कि सोमवार को बैठक में निगमीकरण करने या न करने को लेकर चर्चा नहीं होगी बल्कि निगमीकरण के बाद ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियां कैसे चलेंगी, स्टाफ का बंदोबस्त कैसे होगा, वो अपने आप कैसे हथियारों का उत्पादन और खुले बाजार में बेचेंगी इसी पर चर्चा होनी है।
हिंदी अख़बार हिंदुस्तान की एक ख़बर के अनुसार, सरकार अब अपने फैसले पर पीछे हटने के मूड में नहीं है। निगमीकरण के बाद ऑर्डिनेंस फैक्टरियों के भविष्य की योजनाओं पर अभी तक रक्षा मंत्रालय ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। इसकी बजाय प्रतिरक्षा संगठनों से ही प्रस्ताव मांगे जा रहे हैं। सोमवार की बैठक में इन्हीं प्रस्तावों पर चर्चा होनी है।

पिछले महीने जब 41 ऑर्डनेंस फैक्टिरयों के करीब 90 हजार कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए तो रक्षा मंत्रालय ने इस पर विचार करने के लिए और रक्षा उत्पादन के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। इसी समिति की बैठक सोमवार को दिल्ली के साउथ ब्लॉक में दोपहर तीन बजे बैठक होनी है।

इसमें आरएसएस से जुड़े भारतीय प्रतिरक्षा मजदूर संघ, नेशनल कॉनफेडरेशन ऑफ डिफेंस वर्कर्स समेत तीन संगठनों को आमंत्रित किया गया है। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में कर्मचारी संगठनों से पूछा जाएगा कि निगमीकरण में जाने के बाद कर्मचारियों के भत्ते, स्वास्थ्य, सेवाएं और अन्य सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं को कैसे लागू किया जाए।

इसके साथ ही कर्मचारियों के वेतन के लिए बजट का इंतजाम किन स्रोतों से किया जा सकता है। भविष्य में मिलने वाले हथियारों के ऑर्डरों को कैसे पूरा किया जाएगा। क्योंकि फैक्टरियों का वर्तमान ढांचा पूरी तरह सरकारी बजट पर निर्भर है। दूसरी तरफ कर्मचारी संगठनों ने सोमवार को जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने की अपील की है। कर्मचारी निगमीकरण को पिछले दरवाजे से निजीकरण की सरकार की साजिश मान रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में मुरादनगर के एक कर्मचारी शिवनाथ यादव आरएसएस से जुड़े हैं और उसके कर्मचारी संगठन भारतीय मजदूर संघ के पदाधिकारी भी हैं। उन्होंने वर्कर्स यूनिटी से कहा कि देश भर के 41 आर्डनेंस कारखानों को निगमीकरण कर बेच देने की साजिश मोदी सरकार रच रही है। इतने कर्मचारी आक्रोशित हैं लेकिन सरकार इतनी बेशर्म है कि उसकी कान पर जूं नहीं रेंग रही।

आरएसएस की विचारधारा से जुड़ी बीजेपी ही इस समय केंद्र सरकार में सत्तारूढ़ है और इससे जुड़े कर्मचारियों में आक्रोश साफ देखा जा सकता है। अच्छे दिन का वादा करके 2014 में सत्ता में आई मोदी सरकार ने कर्मचारियों के लिए काफी मुश्किलें खड़ी की हैं। पिछले पांच सालों में श्रम क़ानूनों को रद्दी बनाने में सरकार ने कोई कसर नहीं रखी।

ऑर्डनेंस फैक्टरियों की तरह ही देश भर में रेलवे के सात कारखानों को भी मोदी सरकार निगम बनाने की का फैसला ले चुकी है।
पूर्वोत्तर रेलवे कार्मिक यूनियन (पीआरकेयू) के महामंत्री राकेश मिश्रा ने मोदी सरकार के निगमीकरण के फैसले को बोगस करार देते हुए कहा है कि निगमीकरण असल में निजीकरण का रास्ता तैयार करने के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा, “ठीक यही तर्क बीएसएनएल के बारे में दिया गया। उसका निगमीकरण किया गया आज दो साल के अंदर ही उसे 14,000 करोड़ का रुपये का घाटा हो चुका है।”

असल में जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है उसने पूंजीपतियों के मुनाफे बढ़ाने वाले कामों को बहुत ही तानाशाही रवैये के साथ लागू करने की कोशिश की है। चाहे नोटबंदी हो या जीएसटी या फिर 44 श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर उनकी जगह सिर्फ चार श्रम संहिताएं या लेबर कोड लाना कारपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने की सरकार ने कोशिश की है।

यही वजह है कि कार्पोरेट घरानों की दौलत में पिछले चार सालों में अकूत बढ़ोत्तरी हुई है। बीती जनवरी में आई ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सबसे धनी एक प्रतिशत पूंजीपतियों के पास देश की दो तिहाई दौलत (73ः) आ चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2006-2015 के बीच अरबपतियों की आमदनी छह गुने की रफ्तार से बढ़ी जबकि आम वर्कर की आमदनी 2ः की दर से बढ़ी।

इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 में हर दो दिन में एक पूंजीपति अरबपति बना और इतिहास में अरबपतियों की सबसे अधिक संख्या हो गई। जो सबसे हैरान करने वाली बात है कि 2016 की दूसरी तिमाही से लेकर 2018 की दूसरी तिमाही के बीच देश में जितनी दौलत पैदा हुई उसका 82ः हिस्सा देश के शीर्ष 1ः पूंजीपतियों के पास गया। एटक की जनरल सेक्रेटरी अमरजीत कौर ने मोदी सरकार को ‘बहरा’ और ‘वाचाल’ बताया है। वर्कर्स यूनिटी को दिए एक विशेष साक्षात्कार में अमरजीत कौर ने कहा, “ये सरकार बहरी ज्यादा है, बोलती बहुत ज्यादा है और सुनने को बिल्कुल भी राजी नहीं है।”

श्रम कानूनों में जारी बदलाव पर नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि ‘श्रम क़ानूनों में मनमाने तरीक़े से बदलाव किया ही जा रहा था कि अब ट्रेड यूनियन एक्ट को भी बदलने की घोषणा हो गई है।’ ये सारे बदलाव पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने वाले और सरकारी कंपनियों को कौड़ियों के मोल कारपोरेट घरानों को देने के लिए किए जा रहे हैं। मोदी सरकार जिस रफ्तार से पूंजीपतियों के हक में काम कर रही है आशंका है कि आने वाले पांच सालों में सार्वजनिक क्षेत्र का नामो निशान नहीं बचेगा। क्योंकि दोबारा सत्ता में आने के 30 दिन के अंदर मोदी सरकार ने देश की 40 से अधिक सरकारी कंपनियों को बेचने का फैसला कर लिया था। इसके लिए बकायदा 100 दिन का एक्शन प्लान बनाया गया।

रेलवे कारखानों के निजीकरण का फैसला हुआ उस समय कर्मचारी बहुत आक्रोशित थे। लंबे समय से संघर्षों से बाहर रहने की वजह से सुस्त पड़ चुकीं ट्रेड यूनियनों और फेडरेशनों ने काफी शोर मचाया लेकिन मोदी सरकार ने रेलवे में यूनियन का चुनाव करने की घोषणा कर दी। जिस समय कर्मचारी करो या मरो की स्थिति में आए महीनों तक रेलवे कारखानों के बाहर विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन रेलवे के दूसरे विभागों की यूनियनों ने जबानी वादों के अलावा साथ नहीं दिया।

चुनाव की घोषणा होते ही ट्रेड यूनियनें और फेडेरेशनें निगमीकरण-निजीकरण को भूलकर चुनाव की तैयारी करने लगीं। इसके अलावा संघ और बीजेपी से जुड़ी ट्रेड यूनियनों का दोहरा व्यवहार एकीकृत मजदूर आंदोलन के होने में एक बड़ी रोड़ा बना। संघ के रेलवे कर्मचारी यूनियन से जुड़े एक यूनियन लीडर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि ‘संघ से जुड़े मजदूर संघ मजदूरों में कनफ्यूजन पैदा कर मोदी सरकार के निजीकरण को आसान करने का काम कर रही हैं, चाहे बीती जनवरी में देशव्यापी आम हड़ताल की बात हो या लेबर कोड का मामला।’

उनका कहना है कि ‘इसी तरह जब चार लेबर कोड लेकर सरकार आई तो रस्मी विरोध के बाद भारतीय मजदूर संघ ने वेज कोड (मजदूरी संहिता) को पास करने की हरी झंडी दे दी। आम हड़ताल में वे शुरू में साथ थे लेकिन आम हड़ताल के चंद दिन पहले उन्होंने अपने हाथ खींच लिए और उससे जुड़े कर्मचारी हड़ताल पर नहीं गए।’ लेकिन दूसरी तरफ वामपंथी ट्रेड यूनियने भी कोई जुझारू आंदोलन करने में नाकाम रही हैं और लड़ाई को आर्थिक हितों तक महदूद करने की वजह से आम मजदूरों में उनका आधार तेजी से खिसक रहा है।

मजदूर आंदोलनों पर करीब से नजर रखने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राकेश रंजन कहते हैं, “जैसे जैसे मजदूर आंदोलन से मजदूर राजनीति अलग होती गई है उनका आंदोलन भी कमजोर पड़ता गया है और पीछे हटता गया है।” वो कहते हैं कि जबतक मजदूर वर्ग अपनी राजनीति को नहीं समझेगा, उसपर फिर से अपनी पकड़ नहीं बनाएगा, लड़ाईयां हारता जाएगा।

शायद यही वजह है कि बीएसएनएल, एयर इंडिया, रेलवे, ऑर्डनेंस, विश्विद्यालय, अस्पतालों को निजी हाथों में देने की खुल्लमखुल्ला घोषणा और कोशिश के बावजूद ट्रेड यूनियनें एक निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार नहीं हो पा रही हैं।

( वर्कर्स यूनिटी से साभार एवं संपादित )

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