पूँजीपतियों की बल्ले-बल्ले

कार्पोरेट को मंदी का तोहफा और बेरोजगार हुए मजदूरों को ठेंगा

मोदी सरकार का ग़जब का खेल! पूँजीपतियों पर कितनी मेहरबान है मोदी सरकार, इसके नमूने रोज दिखने को मिल रहे हैं। ताजा उदहारण सामने है।

लगातार मंदी की मार से झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देना के बहाने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कार्पोरेट जगत के लाभ के लिए कई ऐलान किए है। लेकिन उसी मंदी के बहाने भारी पैमाने पर मजदूरों की जो छंटनी हुई है, उनके लिए जनाब मोदी के पिटारे खाली हैं। इनकम टैक्स में बदलाव हो गया, परन्तु नौकरी पेशा तबके को इसका कोई लाभ नहीं मिला। फिरभी भक्तजन खुश हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा और जीएसटी काउंसिल की बैठक से पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को कंपनी और कारोबारियों को राहत देते हुए कॉरपोरेट टैक्‍स घटाने का ऐलान किया। मनमानापन यह कि संसद में पारित करने की जगह मोहतरमा वित्त मंत्री ने अध्‍यादेश का सहारा लिया और आयकर कानून में बदलाव कर दिया। यह फैसला 1 अप्रैल 2019 से लागू होगा। सरकार की इस घोषणा से सरकार को सालाना 1.45 लाख करोड़ का राजस्‍व घाटा होगा।

असल में मोदी सरकार ने कैसे दिया लाभ

20 सितंबर की सुबह एलान हुआ कि सरकार ने इनकम टैक्स अधिनियम 1961 और फाइनांस एक्ट 2019 में बदलाव कर दिया गया है। इसके अनुसार भारतीय कंपनियों को दो में एक विकल्प दिया गया है। कंपनियों को 22 प्रतिशत का इनकम टैक्स का विकल्प चुनना होगा। इस लिहाज़ से ऐसी कंपनियों को प्रभावी रूप से 25.17 प्रतिशत टैक्स देना होगा। मेक इन इंडिया की गाड़ी को धक्का देने के लिए भी टैक्स घटाया गया है।

1 अक्तूबर 2019 के बाद नया निवेश करने पर 15 प्रतिशत टैक्स लगेगा। इस तरह मैन्यूफैक्चरिंग पर प्रभावी रूप से टैक्स 17.01 प्रतिशत हो जाएगा। इसके साथ ही सीमारमण ने पांच जुलाई को अपने पहले बजट में आय पर अधिक अधिभार के रूप में घोषित धनाढ्यों उच्च दर से लगने वाली कर समाप्त करने की भी घोषणा की।

साथ ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिये डेरिवेटिव समेत प्रतिभूतियों की बिक्री से होने वाले पूंजीगत लाभ पर धनाढ्य-उपकर समाप्त करने का भी निर्णय लिया गया है। वित्तमंत्री ने एक अन्य राहत देते हुए कहा कि जिन सूचीबद्ध कंपनियों ने पांच जुलाई से पहले शेयरों की पुनर्खरीद की घोषणा की है, उन्हें भी किसी प्रकार का कर नहीं देना होगा।

इस कदम से देशी-विदेशी सभी कंपनियो को भारी लाभ मिलेगा, लेकिन सबसे अधिक फायदा हिंदुस्तान यूनिलिवर, कोलगेट, आईटीसी, ब्रिटानिया और नेस्ले जैसी कंपनियों को होगा, जिन्हें अभी 30-35 प्रतिशत का टैक्स चुकाना पड़ता है।

अर्थव्यवस्था को भारी चपत, वित्तीय घाटा बेइंतहा

आर्थिक विश्लेषक गिरीश मालवीय के अनुसार 2019-2020 के पहले साढ़े पांच महीने में शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह (नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन) में भारी कमी देखने को मिली है। आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से 17 सितंबर की अवधि में सरकार का प्रत्यक्ष कर संग्रह 4.7 प्रतिशत बढ़कर 5.50 लाख करोड़ रुपये रहा है जो इससे पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में 5.25 लाख करोड़ रुपये रहा था।

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जबकि पूरे वित्त वर्ष के लिये सरकार ने कर संग्रह में 17.5 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य तय कर रखा है।
कम टैक्स कलेक्शन के कारण देश का राजकोषीय घाटा बढ़ गया है। जून माह की तिमाही में चालू वित्त वर्ष का राजकोषीय घाटा 5.47 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जो सरकार के साल 2019-20 के अनुमानित बजट का करीब 77 प्रतिशत है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीने में ही पूरे कारोबारी साल के अनुमानित वित्तीय घाटे की 77 फीसदी सीमा पार कर ली है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में वित्तीय घाटा 3.3 फीसदी रहने का अनुमान रखा है जो हर हाल में बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। सरकार की इस घोषणा से सरकार को सालाना 1.45 लाख करोड़ का राजस्‍व घाटा होगा।

वे लिखते हैं कि जून महीने के बाद से निवेशकों ने 4.5 अरब डॉलर भारतीय बाज़ार से निकाल लिए हैं। 1999 के बाद पहली बार किसी एक तिमाही में इतना पैसा बाहर गया है। इसलिए मजबूर होकर सरकार को यह घोषणा करनी ही पड़ी है।

सरकार का अनुमान है कि कॉरपोरेट टैक्स में करीब 10 फीसदी कमी करने से राजस्व पर 1.45 लाख करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा, जो जीडीपी के 0.7 फीसदी के बराबर है। 2019-20 में  यह घाटा कही बड़ा होने जा रहा है।

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वित्त मंत्री के ऐलान और संवैधानिक जनतंत्र

विश्लेषक मुकेश असीम ने ठीक ही सवाल उठाया है कि जिस तरह से मोदी सरकार कर दरों को लगातार कार्यपालिका के फैसलों के द्वारा बदल रही हैं उससे पूरे बुर्जुआ जनतंत्र, संविधान, चुनाव और संसदीय व्यवस्था पर ही गहरा सवाल उठ खड़ा होता है। वर्तमान संवैधानिक जनतंत्र के सिद्धांत अनुसार कर लगाना और खर्च करना अर्थात बजट को स्वीकृत करना यह निर्वाचित संसद का सार्वभौम व सर्वोच्च अधिकार है। अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। बात रोज़गार के माँग की हो रही थी कि लोगों के पास पैसे नहीं हैं। इस फैसले से कॉरपोरेट को लाभ तो मिला है लेकिन लोगों को क्या मिला? उनके पास माँग को बढ़ाने के लिए पैसा कहाँ से आएगा? क्या कॉरपोरेट टैक्स में जो कमी आएगी उसका लाभ सैलरी में वृद्धि के रूप में देखने को मिलेगा?

पूँजीपतियो के दोनों हाथ में लड्डू !

यह गौरतलब बात है कि पिछली बजट घोसणा के बाद से ही मंदी व् सुस्ती के बहाने ऑटो सेक्टर से लेकर गारमेंट, खाद्य, रियल स्टेट तक में लाखों मजदूरों की छंटनी हुई। मोदी सरकार उन मजदूरों का हाल भी जानने की ज़रुरत नहीं है। लेकिन अपने कार्पोरेट मित्रों के लिए सारे पिटारे खुले हैं।

इससे कार्पोरेट को जहाँ पुराने मजदूरों से फुरसत मिल गई, वहीँ इस छूट से उन्हें कारू का खजाना भी मिल गया। यानी दोनों हाथ में लड्डू! मोदी भक्तों के लिए यह भी ख़ुशी की बात होगी!

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