शिक्षक और पत्रकार कौशलेंद्र प्रपन्ना नहीं रहे, दिल्ली में इलाज के दौरान हुई मौत

शिक्षा में सुधार पर लेख के कारण मिली बेईज्जती, लेखक सदमे में थे


दिल्ली। शिक्षक और पत्रकार कौशलेंद्र प्रपन्ना की 14 सितंबर को दिल्ली के रोहिणी स्थित सरोज अस्पताल में निधन हो गया। यह जानकारी कौशलेंद्र प्रपन्ना के बड़े भाई और दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर राघवेंद्र प्रपन्ना ने दी। 45 वर्षीय प्रपन्ना को पिछले 5 सितंबर को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था।


उनके मित्र और पत्रकार दीपक कुमार कहते हैं कि एक शिक्षक, शिक्षक दिवस पर भर्ती हुआ और हिंदी दिवस पर उसकी इस व्यवस्था ने जान ले ली। कौशलेंद्र प्रपन्ना बेहद संवेदनशील और शिक्षा सुधार को लेकर देश के उन चंद लोगों में शामिल थे जो भारतीय शिक्षा और उसकी पद्धति को बेहतर बनाना चाहते थे।


आरोप है कि शिक्षा सुधार पर लेख लिखने के कारण उनके संस्थान टेक महिंद्रा फाउंडेशन जिसमें वह पिछले छह वर्षों से काम कर रहे थे, के कुछ अधिकारियों उन्हें बेइज्जत किया था और वह सदमे में आईसीयू में भर्ती हुए थे। वे टेक महिंद्रा फाउंडेशन में पिछले 6 साल से वाइस प्रेसीडेंट एजुकेशन थे।


कौशलेंद्र प्रपन्ना के परिवार में उनकी पत्नी विशाखा अग्रवाल और 8 महीने की बेटी है। हिंदी दैनिक इकोनॉमिक टाइम्स में उन्होंने करीब डेढ़ साल नौकरी की। उसके बाद वह पिछले छह सालों से टेक महिंद्रा फाउंडेशन में वाइस प्रेसीडेंट एजुकेशन थे।

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इससे पहले प्रपन्ना दिल्ली सरकार के स्कूल में बतौर शिक्षक नौकरी कर चुके हैं। उन्होंने शिक्षा सुधार और उन्नति पर कई किताबें लिखी हैं और भारत के सैकड़ों स्कूलों का दौरा किया। शिक्षा की पद्धति को कैसे बेहतर बनाया जाये इसके लिए उन्होंने जापान, इंडोनेशिया और चीन की यात्रा भी की थी।

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वरिष्ठ पत्रकार पीयूष बबेले कौशलेंद्र प्रपन्ना के निधन पर लिखते हैं, ‘कौशलेंद्र एक प्रतिष्ठित कंपनी में शिक्षा के कामकाज से जुड़े थे। पिछले दिनों उन्होंने दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था पर एक लेख लिखा था जो एक प्रतिष्ठित अखबार में छपा था। इस लेख के बाद उनकी कंपनी ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। सिर्फ निकाला ही नहीं बेइज्जत करके निकाला। इस घटना से उनके जैसे संवेदनशील आदमी को हार्ट अटैक आ गया। वह पिछले कई दिन से एक अस्पताल में भर्ती थे। जब उन्हें लेख लिखने के कारण नौकरी से निकाले जाने की खबर एक प्रतिष्ठित वेब पोर्टल पर चलाई गई तो प्रतिष्ठित कंपनी ने अपनी ताकत लगाकर वह खबर हटवा दी और आज कौशलेंद्र दुनिया छोड़कर चले गये।

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मुझे नहीं पता कि उनकी मृत्यु उन प्रतिष्ठित पत्रकार की हत्या की तरह मीडिया की सुर्खियां बन पाएगी या नहीं लेकिन मेरी नजर में कौशलेंद्र अभिव्यक्ति की आजादी के लिए शहीद हो गए हैं। हम एक भयानक वक्त में जी रहे हैं और जो इस वक्त को भयानक कहने की हिम्मत कर रहे हैं वे मर रहे हैं।’


जनज्वार से साभार

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