शहीद यतीन्द्रनाथ का शहादत दिवस

जिनकी शहादत में 5 लाख लोग शामिल थे, उनकी यादनामा गायब है…

अमर शहीद भगत सिंह के साथी क्रांतिकारी शहीद यतीन्द्रनाथ दास (जतीन दास) राजनीतिक अधिकारों के लिए अन्य क्रांतिकारियों के साथ जेल में 63 दिनों तक भूख हड़ताल पर रहे। 90 वर्ष पूर्व 13 सितम्बर 1929 को लाहौर जेल में अनशन के 63वें दिन जतिन दा शहीद हो गए। तबतक क्रांतिकारियों की माँगें मानी ली गईं, लेकिन इस जीत की ख़बर सुनने के लिए जतिन दा नही रहे थे…।

देश के क्रांतिकारियों पर शानदार काम करने वाले साथी सुधीर विद्यार्थी ने यतीन्द्रनाथ पर एक छोटा लेख भेजा है।

जतिन दा के शहादत दिवस (13 सितंबर) पर हम उसे हूबहू प्रकाशित कर रहे हैं…

लखनऊ की बारादरी में इस बलिदान की अर्धशती पर 13 सितम्बर 1979 को दुर्गा भाभी के हाथों से यतीन्द्र पर एक स्मृति डाक टिकट जारी किया गया था। इस अवसर पर शचीन्द्रनाथ सान्याल की धर्मपत्नी प्रतिभा सन्याल सहित देश के अनेक क्रांतिकारी वहां श्रद्धानत थे।

कलकत्ता में यतीन्द्र के घर 1 अमिता घोष रोड पर आज विकट सन्नाटा है। कोई देशवासी उन दरो-दीवारों को अब नहीं देखता जहां कभी उस क्रांति-कथा का सपना बुना गया था जो इतिहास में लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से दर्ज है। यतीन्द्र के भाई दादा किरण चन्द्र दास भी वर्षों पूर्व दिवंगत हो गए। उनके बेटे मिलन चन्द्र दास के पास बंगाल के इस अप्रतिम शहीद का यादनामा पूरी तरह खो जा चुका है।

कौन याद करेगा कि यतीन्द्र की अर्थी लाहौर से दिल्ली होते हुए जब बंगाल पहुंची तब कलकत्ता की सड़कों पर उसके पीछे 5 लाख लोग थे।

1980 में कलकत्ता के उस श्मशान में भी ‘एकला चलो रे’ गाने वाले शहीद यतीन्द्र का पुतला स्थापित किया गया जिस जगह देशवासियों ने उन्हें अंतिम विदाई दी थी!

प्रणाम यतीन्द्र!

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