मोदी-2 सरकार के 100 दिन

मंहगाई-बेकारी चरम पर है और कश्मीर, पाकिस्तान, गो-रक्षा आदि के भ्रम के बीच भीड़-तंत्र की हमलावर मानसिकता जनता के एक बड़े हिस्से को जकडे हुए है

मोदी-2 सरकार बनने के साथ उसने 100 दिन का एक रोड मैप प्रस्तुत किया था। इसी के साथ अपने दूसरे कार्यकाल के पहले बजट में ज़नाब मोदी ने 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का एक शिगूफा भी उछाला। अब 100 दिन पूरे होने पर हक़ीक़त सामने है।

रफ़्तार पकड़ती मंदी-छंटनी…

इन 100 दिनों के दौरान सार्वजनिक उपक्रमों के निगमीकरण के रास्ते निजीकरण की मुहिम ने जोर पकड़ लिया। भारत में 24 सरकारी कंपनियों के विनिवेश और निजीकरण की प्रक्रिया बड़े पैमाने पर शुरू हो गई। मज़दूर अधिकारों पर हमले और तेज करते हुए 4 श्रम संहिताओं को लाने के क्रम में आनन-फानन में वेतन श्रम संहिता-2019 पारित करा लिया। अन्य श्रम संहिताएँ पारित होने की प्रक्रिया में हैं।

पांच तिमाही पहले जो अर्थव्यवस्था आठ प्रतिशत की दर से विकास कर रही थी, वो गिरते-गिरते पांच प्रतिशत पर पहुंच गई है। दरहक़ीक़त आर्थिक विकास दर पाँच, छह या सात प्रतिशत नहीं है बल्कि यह शून्य प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, क्योंकि असंगठित क्षेत्र के आँकड़े इसमें शामिल ही नहीं किए जाते हैं।

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उधर मंदी का बहाना बनाकर मजदूरों की बड़े पैमाने पर छंटनी हो रही है। मंदी का सारा भार मजदूरों पर थोंपा जा रहा है। 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के परोसे गए सपने के बीच देश का लगभग प्रत्येक क्षेत्र आर्थिक मंदी की चपेट में आने लगा है। ऑटोमोबाइल, फ़ूड, गारमेंट, हीरा कारोबार से लेकर रियल स्टेट तक छंटनी-बंदी का भयावह दौर चल रहा है।

कभी राईस मानीजाने वाली कंपनी ओएनजीसी को क़र्ज़ में डूबी गुजरात पेट्रोलियम कार्पोरेशन के शेयर ख़रीदने पड़े। साथ ही उसे हिंदुस्तान पेट्रोलियम में सरकार की हिस्सेदारी भी ख़रीदनी पड़ी। नतीजा ये हुआ कि इस राईस सरकारी कंपनी को हाल में क़र्ज़ लेना पड़ा है। गोला-बारूद बनाने वाली सरकारी आयुध कंपनी हो या एचएएल, बिजली या सड़क परिवहन, सभी निजीकरण की जद में हैं।

साथ ही अंधराष्ट्रवाद की खतरनाक मुहीम

इसी के साथ संघ पोषित भाजपा सरकार घृणा की राजनीति और अंधराष्ट्रवाद के ख़तरनाक मुहीम के साथ मजदूरों तथा आम मेहनतकश जनता पर एक के बाद एक हमले कर रही है। कश्मीरी जनता की आज़ादी और जनतान्त्रिक अधिकारों को कुचलने, अनुच्छेद-370 मनमाने तरीके से ख़त्म करने और जम्मू-कशमीर को खंडित करने के साथ बेकारी-महंगाई से त्रस्त मेहनतकश जनता और मध्यवर्ग को अंधराष्ट्रवाद के अंध कूएँ में धकेल दिया।

5 ट्रिलियन का रोडमैप और हक़ीक़त

मोदी-2 के 100 दिन पूरे होते ही केंद्र सरकार ने आने वाले वक्त में भारत को 5 ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाने के लक्ष्य का रोडमैप जारी किया है। इसके तहत निवेश बढ़ाने और रोज़गार के नए अवसर पैदा करने के लिए दो कैबिनेट समितियां बनाई गई हैं। ये पैनल हैं ‘निवेश एवं विकास पैनल’ और ‘रोज़गार एवं कौशल विकास पैनल।’ प्रधानमंत्री खुद इन दोनों पैनलों की अध्यक्षता करेंगे।

भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में देश के इंफ्रास्ट्रक्चर में आने वाले वक्त में 100 लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य रखा गया है। इसमें से 50 लाख करोड़ रुपये अकेले रेलवे के इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च किए जाएंगे।

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एक तरफ रेलवे को निजी मुनाफाखोर कंपनियो को सौपने का काम गति पकड़ चुका है। 100 दिनों में ही दो तेजस ट्रेनों का संचालन निजी हाथों में सौपने व सभी 7 रेल कोच व इंजन फक्ट्रियां निगमीकरण से निजीकरण की ओर बढ़ गई हैं। पिछले कुछ सालों में अलग-अलग सरकारें इसके कुछ कामों जैसे कैटरिंग, ट्रेनों के भीतर की सेवाएं और कुछ दूसरे कामों को निजी कंपनियों को सौंपती रही हैं।

ज़ाहिर है की इन्फ्रास्ट्रक्चर में खर्च का यह मद सीधे अम्बानी-अडानी आदि मुनाफाखोरों की थैली में जाएगा। दूसरी ओर तबाह अर्थव्यवस्था की हक़ीक़त से ध्यान भटकाने के लिए भी 5 ट्रिलियन का ख़्वाब भक्त जन को राहत देने वाला होगा।

नोट बंदी, जीएसटी, बैंकों के एनपीए : मोदी के तीन मास्टर स्ट्रोक, तबाही के स्ट्रोक

बड़े पैमाने पर उद्योगों की तबाही का सिलसिला नोटबंदी से बाद से शुरू हुआ। फिर आठ महीने बाद जीएसटी का असर पड़ा। इसी के साथ बैंकों के एनपीए (पूँजीपतियो द्वारा बैंकों से हड़पी गई राशि) का असर पड़ा। इन सबके बाद ग़ैरबैंकिंग वित्तीय कंपनियों के संकट का असर पड़ा। यानी अर्थव्यवस्था को तीन साल में तीन बड़े-बड़े झटके लगे हैं, जिनकी वजह से बेरोजगारी बढ़ी है।

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सीएमआई के आँकड़े दिखाते हैं कि देश में कर्मचारियों की संख्या 45 करोड़ थी, जो घट कर 41 करोड़ हो गई है। इसका मतलब यह है कि चार करोड़ लोगों की नौकरियां या काम छिन गए हैं। इसमें असंगठित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुई बेरोजगारी और मंदी के बहाने हुई भारी छंटनी के आंकडे शामिल नहीँ हैं। बैंकों के विलय, कंपनियो के निजीकरण, सरकारी विभागों में 30 साल नौकरी या 50 साल उम्र के आधार पर जबरिया अवकाश योजना (सिआरएस) आदि के बाद की स्थिति और भयावह होने वाली है

तीन दशक से जारी तबाही का सिलसिला तेज रफ़्तार पकड़ा

1990-91 के समय से सरकारी कंपनियों को निजी कंपनियों को बेचने की शुरु हुई प्रक्रिया कांग्रेस, बीजेपी और दूसरी सरकारों के समय में भी जारी रही है और इन सालों के भीतर टेलीफ़ोन कंपनी एमटीएनएल, हिंदुस्तान ज़िंक, भारत अल्युमिनियम और सेंटोर होटल जैसी सरकारी कंपनियों को निजी कंपनियों के हाथों बेचा गया है। मजदूर अधिकारों में डकैतियां बढ़ती गईं। जनतांत्रिक अधिकारों पर बढ़ाते गए और जनता का दमन तेज हुआ। नरसिंहा राव-मनमोहन सरकार के दौरान देश को बेंचने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह मोदी सरकारों के दौरान पूरी रफ़्तार में है। मंहगाई-बेकारी चरम पर है और कश्मीर, पाकिस्तान, गो-रक्षा आदि के भ्रम के बीच भीड़-तंत्र की हमलावर मानसिकता जनता के एक बड़े हिस्से को जकडे हुए है।

कार्टून साभार

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