क्या है जनता के पैसों का उचित इस्तेमाल?

महिलाओं को मुफ़्त यातायात की नीति पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाये गए सवाल पर कुछ प्रश्न

जून महीने की शुरुवात में दिल्ली के मुख्य मंत्री ने घोषण की थी कि दिल्ली मेट्रो और बस में महिलाओं के लिए यातायात मुफ्त कर दिया जाएगा। मेट्रो कॉर्पोरेशन और केंद्रीय सरकार ने शुरुआती स्तर पर इसका विरोध किया था, किन्तु अब मुनाफाखोरी की तरफ़दारी में देश का सुप्रीम कोर्ट भी शामिल हो गया है। 6 सितंबर को जस्टिस दीपक गुप्ता और अरुण मिश्र की अगवाई में सुप्रीम कोर्ट के बेंच ने इस नीति को ‘जनता के पैसों का दुरूपयोग’ बताया, और मेट्रो के मुनाफ़े को हो सकते नुक्सान की दुहाई दी। इसी कड़ी में उन्होंने जनता को किसी भी प्रकार की मुफ्त सार्वजनिक सेवा दिए जाने की नीति की भी निंदा की है।

मज़दूरों के संघर्षों में कार्यस्थल से घर के यातायात की सुविधा एक महत्वपूर्ण मांग रही है। आधुनिक, तेज़ और सुविधाजनक यातायात एक बुनियादी काम की शर्त है। और तो और मेट्रो में इस्तेमाल होने वाली ज़मीन, उसमें लगने वाली बिजली व अन्य संसाधन सरकारी भागीदारी से उन्हें मिले हैं और मेहनतकश जनता के श्रम से चलते हैं। 2017 में मेट्रो के भाड़े में बढ़ोतरी के बाद मेट्रो के 4.2 लाख यात्री कम हो गए। यह जनता का वो हिस्सा है जो सबसे ज़्यादा मेहनत करके सबसे कम वेतन पाता है, और अब मेट्रो की जगह बस की धीमी गति की सवारी से घर से कार्यस्थल का लम्बा सफ़र तय करता है।

इस बदलाव का सबसे भारी दुशप्रभाव कामकाजी महिलाओं पर पड़ा है, जिन्हें कार्यस्थल के बाद घर जा कर भी कई काम निपटाने होते हैं। वहीँ रात तक मेट्रो के महिला डब्बे बिलकुल खाली हो जाते हैं, और उन्हें शहर भर खींचने में लग रहा सारा संसाधन बर्बाद होता है, किन्तु आसमान छूते भाड़े के कारण लाखों ज़रुरतमंद लोग इसका इस्तेमाल नहीं कर पाते।

सुप्रीम कोर्ट जवाब दे, क्या खाली मेट्रो चलाना जनता और दुनिया के संसाधनों की बर्बादी नहीं है? क्या आधुनिक साधन मौजूद होने के बावजूद लोगों को भीड़ से भरी, जाम में फंसी बसों में ठूस कर लंबा सफ़र करने को मजबूर करना जनता की उर्जा, और उनके समय की बर्बादी नहीं है? किस तर्क से महिलाओं के लिए निशुल्क मेट्रो सेवा को ‘जनता के पैसे’ का दुरूपयोग कहा गया है? क्या मेहनतकश महिलाएं जनता का हिस्सा नहीं हैं?

शिक्षा व स्वास्थ्य की तरह यतायात हर नागरिक की एक मूलभूत ज़रुरत और अधिकार है। ‘बुनियादी ज़रूरतों’ को पूरा करने का काम सरकार का है, क्योंकि हमारे सारे प्राकृतिक संसाधनों का नियंत्रण सरकार के पास ही है। सेवाओं और वस्तुओं के दाम, व मज़दूरों की आमदनी और उसमें असमानताएं प्राकृतिक नहीं हैं। इन पर नियंत्रण सरकार की नीतियों से ही होता है।

दिल्ली सरकार और केंद्रीय सरकार में चल रहा विवाद दो प्रकार की सरकारी नीतियों के बीच का विवाद है। एक प्रकार की नीतियाँ सरकार को पूरी आबादी के हितों की ओर जवाबदेह मान कर, मूलभूत सुविधाओं को सार्वजनिक रखने के लिए निशुल्क रखने या छूट देने की बात करती है। दूसरी तरह की नीतियां समाज में कुछ बड़े कंपनियों के मुनाफ़े के हित में सभी सेवाओं के नीजिकरण का समर्थन करती हैं, ताकि लोग इनके लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे देने को मजबूर हों। दुर्भाग्य की बात है कि देश की जनता के दम पर बने संविधान पर आधारित सुप्रीम कोर्ट आज जनता के हितों के बनाम मुनाफ़े को ज़्यादा महत्व दे रहा है।

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