डाईकिन मज़दूरों का आन्दोलन

कठिन दौर में एक बेमिसाल संघर्ष का अनुभव

अलवर (राजस्थान) के नीमराना औद्योगिक क्षेत्र में डाईकिन एयर कंडिशनिंग प्लांट के मज़दूरों का पिछले 6 साल से चल रहे संघर्ष आज देश के मज़दूर आन्दोलन में एक प्रमुख अध्याय हैं. यूनियन गठन का अधिकार व बर्खास्त मज़दूरों का कार्यबहाली को लेकर अक्टूबर 2013 में दो महीने का हड़ताल से जो झुझारू संघर्ष का शुरुयात हुआ था, कई उतार-चराव के बाद आज, वो संघर्ष अंतिम चरण से गुज़र रहा है. यह संघर्ष आज का संगठित ट्रेड यूनियन आन्दोलन का सम्भावना और सीमा, दोनों ही उजागर किया है. डाईकिन मज़दूर आन्दोलन का अनुभव पर चर्चा करने से पहले इस आन्दोलन का लम्बा इतिहास को पेश करना ज़रूरी होगा.

आन्दोलन का संक्षिप्त इतिहास:

दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरीडोर का हिस्सा, नीमराना औद्योगिक क्षेत्र का ‘जापानीज जोन’ में स्थित डाईकिन प्लांट, दुनिया का एक नंबर एयर कंडिशनर निर्माता जापानीज कम्पनी डाईकिन का भारत में एकमात्र उत्पादनकारी प्लांट है. 2009 से उत्पादन शुरू होने के बाद प्लांट के अन्दर शोषण-दमन, कम वेतन, असुरक्षित रोजगार से परेशान मज़दूरों ने 2013 का 6 मई को यूनियन गठन के लिए फ़ाइल जमा किया. जून महीने से ही मैनेजमेंट ने मज़दूरों को बर्खास्त करना शुरू कर दिया.

31 जुलाई 2013 को “डाईकिन एयर कंडीशनिंग कामगार यूनियन” पंजीकृत होने के बाद यूनियन के तरफ से 2 अगस्त 2013 को कंपनी मैनेजमेंट के पास 39-सूत्रीय मांगपत्र (वेतन वृद्धि, डी.ए.-बोनस सहित सुविधायें, ठेका मज़दूरों का स्थायीकरण आदि मांगों के साथ) पेश किया. मैनेजमेंट के तरफ से बिना कारन स्थायी-ठेका मज़दूरों का बर्खास्तगी जारी रहा. लगभग 125 मज़दूर बर्खास्त हो गए. इसके जवाब में अक्टूबर 2013 में स्थायी-ट्रेनी-ठेका मज़दूरों ने एकजुट होकर हड़ताल शुरू किया, जो करीब 2 महीने तक चला. अंततः 19 दिसम्बर 2013 को एक त्रिपक्षीय समझौते में हड़ताल समाप्त हुआ.

समझौते के अनुसार 39 मज़दूरों को छोड़कर बाकि सभी मज़दूरों को अन्दर लेने और 80 दिन के अन्दर बाकी 39 मज़दूरों को अन्दर लेने का निर्णय हुआ. मगर कंपनी ने चालाकी से यूनियन पर स्टे आर्डर लेकर आई, और समझौता का उल्लंघना करके 39 मज़दूरों में से 21 मज़दूरों को बर्खास्त कर दिया और करीब 400 ठेका मज़दूर को काम पर वापिस नहीं लिया.

पहली यूनियन बॉडी बिखर जाने के बाद प्लांट के अन्दर शोषण-दमन फिर से तेज़ हो गया. कोई भी मज़दूर अगर आवाज़ उठाता तो उसे तत्काल निलंबित या बर्खास्त कर दिया जाता था. 2015 तक यह सिलसिला चला. 2015 से फिर से मज़दूर एकजुट होना शुरू किया. 16 दिसम्बर 2015 से जयपुर में श्रम विभाग के सामने मज़दूरों ने अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया, जो लगभग एक साल चला.

2 सितम्बर 2016 को देशव्यापी मज़दूर हड़ताल के दिन मैनेजमेंट का दवाव को अनदेखा करते हुए डाईकिन मज़दूरों ने सफल हड़ताल किया और नीमराना ‘जापानीज जोन’ में ‘मज़दूर रैली’ का आयोजन किया. इस समय डाईकिन मज़दूरों के नेतृत्व में इलाकाई स्तर पर मज़दूर एकता कायम करने के लिए ‘नीमराना मज़दूर मंच’ का गठन भी हुआ.

8 सितम्बर 2016 को मज़दूरों ने फिर से यूनियन गठन के लिए फ़ाइल जमा किया. उस दौरान हौंडा मज़दूरों के आन्दोलन में डाईकिन के मज़दूरों ने पूरा सहयोग जताया, और यह दो आन्दोलन का एकजुट आधार पर इलाकाई स्तर पर स्थायी-ठेका मज़दूरों का एकजुट आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए “मज़दूर संघर्ष समिति (अलवर)” का गठन किया गया, जिसमे नीमराना औद्योगिक क्षेत्र से कई यूनियन हिस्सेदारी किया. यूनियन की दूसरी फ़ाइल मैनेजमेंट ने दवाव बनाकर श्रम विभाग से ख़ारिज करवाने के बाद मज़दूरों ने 18 अक्टूबर 2016 को यूनियन गठन के लिए तीसरी फ़ाइल जमा किया.

मैनेजमेंट ने कई मज़दूर नेतायों को निलंबित करना शुरू किया. 21 अक्टूबर को बिना कारन दर्शन मालिक नाम का एक मज़दूर को निलंबित करने पर मज़दूरों ने प्लांट के अन्दर काम बंद कर दिया. मैनेजमेंट ने 51 मज़दूरों के खिलाफ कदम लेने का निर्णय लिया तो मज़दूरों ने नीमराना में रैली का ऐलान किया. अंततः 23 अक्टूबर को त्रिपक्षीय समझौता के जरिये कुछ समय के लिए टकराव को टला गया. नवम्बर 2017 को कम्पनी ने यूनियन की महासचिव दौलत राम को बर्खास्त कर दिया. मगर मज़दूरों ने यूनियन गठन के लिए संघर्ष जारी रखा.

श्रम विभाग करीब एक साल तक प्रस्तावित यूनियन का फ़ाइल पर कोई जवाब न देने पर मज़दूरों ने हाई कोर्ट से आदेश पारित करवाया, और अंततः 29 अगस्त 2018 को श्रम विभाग एक स्वतंत्र यूनियन के हिसाब से “डाईकिन एयर कंडीशनिंग मज़दूर यूनियन” को मान्यता देने में मजबूर हुई. मगर कम्पनी ने इसके जवाब में यूनियन तोड़ने के लिए 30 अगस्त से 3 सितम्बर के बीच 13 मज़दूर नेतायों को भारत के अलग अलग शहरों में ट्रान्सफर कर दिया. 5 सितम्बर 2018 को जब मज़दूरों ने कंपनी गेट पर यूनियन का झंडा लगाने गया तो मैनेजमेंट और पुलिस ने उन्हें रोक दिया.

8 जनवरी 2019 की देशव्यापी मज़दूर हड़ताल : पुलिस की बर्बरता

फिर 8 जनवरी 2019 को देशव्यापी मज़दूर हड़ताल के दिन डाईकिन यूनियन के नेतृत्व में स्थायी-ट्रेनी-ठेका सभी मज़दूर हड़ताल किया और रैली लेकर कंपनी गेट पर झंडा लगाने गया, तो पुलिस ने उनपर बर्बरता के साथ लाठी चार्ज कर दी. 8 तारीख रात को ही 14 मज़दूरों को बिना कोई ऍफ़. आई. आर. सिर्फ डाईकिन मज़दूर होने के नाते गिरफ्तार कर लिया गया. उसके बाद लगातार कई महीना मज़दूरों पर दमन जारी रहा. सैकड़ो मज़दूरों पर गैर-जमानती मुकदमा लगाया गया. यूनियन के अध्यक्ष रुकमुदीन सहित 17 मज़दूर पर संगीन मुकदमें लादकर उन्हें 50 दिन जेल में बंद करके रखा.

यूनियन के अधिकार के लिए, सभी निलंबित-बर्खास्त-ट्रान्सफर ठेका और स्थायी मज़दूरों की कार्यबहाली के लिए ठेका-स्थायी मज़दूर मिलकर करीब 4 महीना दमन को झेलते हुए जुझारू संघर्ष किया, नीमराना क्षेत्र में साँझा रैली और प्रदर्शन किया, अलवर में प्रदर्शन और अनिश्चितकालीन धरना-भूख हड़ताल किया (जो लेख लिखने के समय तक जारी है), जमीनी और क़ानूनी – हर प्रकार का संघर्ष चलाया. मगर कंपनी-प्रशासन-सरकार के मज़दूर विरोधी गठजोड़ के दबाव में यूनियन को पीछे हठना पड़ा. करीब 400 ठेका मज़दूर, 56 निलंबित और 15 ट्रान्सफर स्थायी मज़दूर को बाहर रखकर बाकि स्थायी मज़दूर प्लांट के अन्दर गया, जिससे ठेका मज़दूरों के अन्दर काफी निराशा पैदा हुआ. फिर भी, इतना उतार-चराव कर बाद भी जब तक मैनेजमेंट का शोषण-दमन है, तब तक संघर्ष का सम्भावना भी है. कब कोई चिंगारी डाईकिन प्लांट में संघर्ष का नया आग पैदा करे – यह कोई बोल नहीं सकता. 

संघर्ष का अनुभव:

डाईकिन मज़दूरों का काफी कठिनाइयों के बीच अपना संघर्ष को आगे बढ़ाना पड़ा. 2014 साल में ही राज्य और केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद मज़दूर विरोधी श्रम कानून सुधार तेज हो गया, बड़े पूंजीपतियों के फैदे के लिए नीतियाँ पारित होने लगा, मज़दूर आन्दोलन पर दमन भी बढ़ गया. पिछले 4-5 साल में नीमराना सहित अलवर में कई मज़दूर आन्दोलन, खास कर भिवाड़ी में श्रीराम पिस्टन और उसके बाद तापुकड़ा में हौंडा मज़दूरों के आन्दोलन पर पुलिसिया दमन के बाद उन आंदोलनों को बिखारने में और नीमराना में रूचि बियर, टोयोडा गोसाई, श्योन अल्ट्रावायर जैसे यूनियनों को तोड़ने में पूंजीपति-सरकार-प्रशासन की कामयाबी मिलने के बाद डाईकिन मज़दूरों का आन्दोलन ही नीमराना सहित पुरे अलवर क्षेत्र में चुनौती खड़ा करके रखा था.

इस आन्दोलन की कामयाबी का मतलब है — एक शक्तिशाली यूनियन गठन, स्थायी-ठेका मज़दूरों का एकता बरक़रार रहना, ठेकाप्रथा के खिलाफ संघर्ष, इलाकाई मज़दूर आन्दोलन तेज होना व अन्य कारखानायों में यूनियन गठन का या अस्थायी मज़दूरों का संघर्ष का सम्भावना (जो जापानीज जोन में निसिन, मिकुनी जैसे प्लांटों में या हीरो के अस्थायी मज़दूरों में दिख रहा था). इसलिए डाईकिन मज़दूरों को पुरे अलवर के मालिक वर्ग से लड़ना पर रहा था.

डाईकिन मज़दूर भी संघर्ष को सिर्फ अपने प्लांट में न लड़कर 2016 से “नीमराना मज़दूर मंच” या “ उसके बाद “मज़दूर संघर्ष समिति (अलवर)” जैसे अलग अलग पहल लिया ताकि इलाकाई स्तर पर और एकता बन पाए. मगर इलाकाई स्तर पर संगठित मज़दूर आन्दोलन का खास कोई सहयोग उन्हें नहीं मिला. टोयोडा गोसाई के कुछ बर्खास्त मज़दूर साथी छोड़कर नीमराना औद्योगिक क्षेत्र में उनके संघर्ष में साथ देने लायक कोई उल्लेखनीय यूनियन नहीं था. केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों का सहयोग 6 साल में बहुत ही कम था. इसलिए 2013 का पहला यूनियन ‘एटक’ से सम्बंधित था मगर बाद में डाईकिन मज़दूरों ने स्वतंत्र यूनियन बना लिया. मारुति और हौंडा टपुकड़ा का कुछ संघर्षरत बर्खास्त मज़दूरों का और समय समय में जयपुर में माइको बॉश मज़दूर यूनियन का सहयोग मिला, बीच बीच में मारुति मानेसर व अन्य कई प्लांटों के यूनियनों का समर्थन मिला. ‘मज़दूर सहयोग केंद्र’ के साथियों से तालमेल रहा.

मगर जब सिर्फ डाईकिन प्रबंधन नहीं बल्कि पुरे नीमराना क्षेत्र के मैनेजमेंट ने प्रशासन-सरकार-न्यायपालिका के मदद से डाईकिन यूनियन को तोड़ने के लिए जोर लगा दिया, तब एक व्यापक मज़दूर एकता और संघर्ष के बिना, प्लांट स्तर का ऐसा कोई संघर्ष को, चाहे वो कितना भी जुझारू हो, कामयाबी मिलना बेहद मुश्किल है. मगर फिर भी इस संघर्ष में ऐसा कुछ ताकत था, जो इन कठिनाइयों के बावजूद 6 साल तक संघर्ष को जिंदा रखा और सत्ता को हिला दिया.

यह आन्दोलन सिर्फ पैसा या कुछ सुविधायों के लिए नहीं रहा, बल्कि आन्दोलन के चलते ‘डाईकिन यूनियन’ का गठन सभी मज़दूरों के लिए पूंजीपतियों के प्रबल शक्ति के विपरीत मज़दूर वर्ग का सम्मान, पहचान, ताकत खड़ा करने का सवाल बन गया था. इस वर्ग-संघर्ष में मज़दूर पैसा, नौकरी – कुछ भी खोने के लिए तैयार था, लाठी, जेल कुछ भी झेलने के लिए तैयार था. संघर्ष जितना आगे बढ़ा, दमन जितना तेज हुआ, मज़दूरों के बीच यह भावना उतना ही तेज होने लगा. गेट पर यूनियन की लाल झंडा लहराना – मज़दूरों के लिए इज्ज़त का, लगभग जीवन-मरण का सवाल बन गया था. ट्रेड यूनियन आन्दोलन होने के बावजूद एक समय के बाद डाईकिन आन्दोलन ट्रेड यूनियन के तोलमोल के दायरे से निकल कर दो वर्गों के बीच ऐसा एक संघर्ष का झलक दिखाया.

इसलिए, करोड़ों रुपये नुकसान के बावजूद, भयानक औद्योगिक अशांति के वावजूद ‘डाईकिन यूनियन’ को मान्यता देना डाईकिन मैनेजमेंट के लिए असंभव था. क्यूंकि, यह मान्यता मज़दूरों का एक ऐसा ताकत का जन्म दे सकता था, जो चुनिन्दा स्थायी मज़दूरों का सिर्फ आर्थिक तोलमोल का सवाल नहीं बल्कि शोषण का तंत्र को ही किसी भी समय प्लांट में या पुरे इलाका में चुनौती दे सकता है.

2013 के बाद डाईकिन आन्दोलन में कोई मज़दूर नेता को खरीदना या डरा-धमकाके निष्क्रिय कर देना मैनेजमेंट के लिए संभव नहीं हुआ. मैनेजमेंट ने एक के बाद एक नेतृत्व को टारगेट किया, नौकरी से निकाल दिया. मगर एक तरफ प्लांट के अन्दर नया नेतृत्व उभारके आया, दूसरी तरफ प्लांट के अन्दर के मज़दूरों ने यूनियन प्रक्रिया में हर महीना पैसा देकर बर्खास्त मज़दूरों का खर्चा, यूनियन ऑफिस का खर्चा, क़ानूनी लड़ाई का खर्चा जुटाया. इसलिए बर्खास्त नेतृत्वकारी साथियों का एक टीम 4-5 साल तक लगातार खुल कर जमीनी और और क़ानूनी लड़ाई लड़ पाया, बाकि कारखानों के मज़दूरों के संघर्ष में भागीदारी कर पाया. मैनेजमेंट के लिए प्लांट के अन्दर और बाहर के मज़दूरों के बीच अलगाव पैदा करने का हर तरीका नाकामयाब रहा.  

प्लांट स्तर पर और इलाकाई स्तर पर पूंजीपति वर्ग के साथ सालों तक लड़ाई मज़दूरों के अन्दर एक दूर तक एक ‘वर्गीय राजनीति’ को विकशित किया. इस कारण प्लांट के अन्दर का विभाजन, क्षेत्र, धर्म, जात, लिंग के भेदभाव के खिलाफ एक अंदरूनी संघर्ष भी चला, जो समाज के पिछरापन के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण है. राजस्थान-हरियाणा-हिमाचल के मज़दूरों के बीच एकता, समाज में धार्मिक ध्रुवीकरण के बीच यूनियन अध्यक्ष रुकमुदीन का नेतृत्वकारी भूमिका, अंतर्राष्ट्रीय महिला मज़दूर दिवस पर यूनियन के तरफ से पर्चा बाँटना संभव भी रहा. आन्दोलन के एक चरण पर ठेका मज़दूरों के सवाल पर और अन्य प्लांटों में मज़दूरों पर हमलों के खिलाफ संघर्ष में डाईकिन यूनियन का वास्तविक जुड़ाव बना. मारुति मज़दूरों का सजा के खिलाफ, हौंडा मज़दूरों के समर्थन में, निशिन-मिकुनी-श्योन अल्ट्रावायर में यूनियन गठन के सवाल पर, हीरो मोटोकॉर्प के अस्थायी मज़दूरों के हित के सवाल पर डाईकिन यूनियन सक्रीय भूमिका लिया.

“मज़दूर संघर्ष समिति (अलवर)” के आधार पर हर मई दिवस पर नीमराना जापानीज जोन में रैली का आयोजन किया, हर साल देशव्यापी मज़दूर हड़ताल में स्वतःस्फुरता के साथ सामिल हुआ और सक्रीय प्रचार किया. मगर सबसे महत्वपूर्ण घटना था जब 8 जनवरी 2019 के हड़ताल के पहले डाईकिन प्लांट में 2013 के बाद पहली बार वास्तविक रूप से ठेका-स्थायी मज़दूरों का एकता बन पाया. यूनियन ठेका मज़दूरों का नौकरी का सुरक्षा और स्थायीकरण के लिए संघर्ष का वादा किया, जो ठेका मज़दूरों के बीच उत्साह पैदा किया. 8 जनवरी के रैली में और उसके बाद का संघर्ष में समय समय पर ठेका मज़दूर स्थायी मज़दूरों से भी आगे जा कर लड़ाई में भाग लिया. यह एकता वास्तविक रूप से मैनेजमेंट को हिला दिया. 17 फ़रवरी 2019 को नीमराना औद्योगिक क्षेत्र में पहली बार सिर्फ अस्थायी मज़दूरों के मांगों पर (न्यूनतम वेतन, सुविधाएँ,स्थायीकरण, ठेकाप्रथा का खात्मा आदि) रैली निकाला गया, जिसमे डाईकिन यूनियन भरपूर मदद किया.

मगर संघर्ष के चलते, खास कर अंतिम चरण में कई कमजोरियां दिखाई दिया, जो वर्गीय एकता और आन्दोलन को कमजोर किया. आज के समय में मज़दूर आन्दोलन का और क्रांतिकारी ताकतों का कमजोर स्थिति जुझारू आन्दोलनों के अन्दर भी एक समय के बाद प्रबल शत्रु के सामने एक असहायता पैदा करता है, जिससे आन्दोलन कमजोर पड़ने पर समझौता के लिए चुनावी पार्टियाँ, राजनीतिक नेतायों, केन्द्रीय ट्रेड यूनियन का कोई बड़ा लीडर आदि पर एक निर्भरता पैदा करता है. दूसरी तरफ, आज मैनेजमेंट किसी भी जुझारू यूनियन या ठेका-स्थायी मज़दूरों का एकजुट संघर्ष को मानने के लिए तैयार नहीं है.

ऐसे स्थिति में समझौता का खतरा रहता है की यूनियन या उसका जुझारूपन को छोड़ देना, ठेका मज़दूरों का सवाल को वास्तविक रूप में छोड़ देना. डाईकिन आन्दोलन भी इस खतरा से गुज़र रहा है, जो ठेका मज़दूरों के अन्दर निराशा पैदा कर रहा है. आज सरकार-प्रशासन और भी शक्ति से पूंजीपतियों का साथ दे रहे है, ट्रेड यूनियन का ढांचा पर ही हमला तेज हो रहा है, प्लांट में मज़दूरों को अलग अलग केटेगरी में बांटकर अलग अलग प्लांटों में उत्पादन को बांटकर (जैसे डाईकिन ने नीमराना में ही दूसरी प्लांट शुरू किया जहा एक भी स्थायी मज़दूर के बिना उत्पादन चल रहा है) और ज़रूरत के हिसाब से नया नया अस्थायी मज़दूर भर्ती करके प्लांट स्तर पर यूनियन की ताकत कमजोर किया जा रहा है, हड़ताल को और भी निष्प्रभावी किया जा रहा है. ऐसे समस्यायों या कमजोरियों का समाधान प्लांट स्तर का संघर्ष में समाधान करना लगभग असंभव बन रहा है.

ऐसे समय में मज़दूर आन्दोलन में व्यापक एकता बनाने के दिशा में अलग अलग प्लांटो के मज़दूरों के बीच और जमीनी संघर्षों के अन्दर बेहतर तालमेल, जुझारू और क्रांतिकारी सहयोगी शक्तियों का भरोसेमंद मदद, आन्दोलन का तात्कालिक और दूरगामी लक्ष्यों के बारे में मज़दूरों के अन्दर बेहतर और गहरा राजनीतिक समझदारी और अस्थायी मज़दूरों का भागीदारी को एक प्राथमिक रणनीतिक सवाल के हिसाब से लेना ज़रूरी बन रहा है. डाईकिन मज़दूरों का ऐतिहासिक संघर्ष आज के मज़दूर आन्दोलन के सम्भावना और चुनौतियों के बारे में महत्वपूर्ण अनुभव हाज़िर किया है.     

भूली-बिसरी ख़बरे

%d bloggers like this: