पूंजीवादी असमान विकास से बढ़ते स्लम्स

विगत दशकों में शहरीकरण की तेज गति के कारण स्लम्स एरिया में रहने वालों की संख्या बढ़ी है। इसका सबसे बड़ा कारण पूंजीवादी असमान विकास है। यूएन की रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक विश्व की जनसंख्या करीब दो अरब के आसपास हो जाएगी। 2030 तक भारत में 40 करोड़ से अधिक लोग शहरों में बसे होंगे। मौजूदा समय में शहरों में बसे प्रत्येक छह परिवारों में से एक परिवार गंदी बस्तियों यानी स्लम्स में रहता है और आने वाले वर्षों में यह संख्या बढ़ेगी। पूंजीवादी सरकार भले ही देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियम डालर करने का सपना दिखाए, लेकिन हकीकत यह है कि देश में गैरबराबरी बढ़ रही है। वैश्विक स्तर पर सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) को हासिल करने के लिए शहरी गरीबों के हालात को बदलने के एजेंडे पर हस्ताक्षर के बाद भी सरकारों का ध्यान कुछ मुट्ठी भर पूंजीवादी घरानों को सुविधाएं देने तक ही सीमित है।

दिल्ली में 880 से ज्यादा छोटे-बड़े स्लम्स एरिया हैं, जिनकी कुल आबादी करीब बीस लाख है। यहां उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, आसाम, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों से लोग आकर बसे हैं। समान टैक्स भरने के बावजूद अधिकतर मलिन बस्तियों में साफ सफाई का कोई इंतजाम नहीं है। यहां शौचालय, सीवर लाइन, नालियां और कूड़े के निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है। प्राथमिक शिक्षा के लिए स्लम्स एरिया के आसपास स्कूल तो खोले गए हैं, लेकिन यह स्कूल भी सामाजिक भेदभाव, सरकारी उपेक्षा और अव्यवस्था के शिकार हैं। स्वच्छ भारत मिशन के बावजूद यहां पर कोई सीवर व्यवस्था नहीं है, जिस कारण से घरों में शौचालय नहीं बनाए जा सकते हैं।

यमुना नदी के किनारे बसे गीता कालोनी का इलाका नई दिल्ली के मध्यवर्ग की रिहाइशी जगह है। यहां हजारों की संख्या में बड़े-बड़े फ्लैट्स, अपार्टमेंट और बंगले हैं। इन्हीं के बीच एक छोटे पार्क नुमा जगह पर कई दशकों से बसा है सफेदा बस्ती स्लम एरिया। एक दशक पहले सफेदा बस्ती को बीच से चीरते हुए एक सड़क बनाई गई, जिससे एक बड़ा और एक छोटा इलाका विकसित हुआ। बड़े एरिया का नाम सफेदा बस्ती और छोटे का नाम नर्सरी बस्ती रखा गया। बस्तीवासियों ने अलग होना पसंद नहीं किया और दोनों नाम मिलाकर सफेदा और नर्सरी बस्ती नाम रख लिया। एमसीडी ने फाइलों में सफेदा और नर्सरी बस्ती स्लम एरिया लिख दिया।

यह स्लम एरिया शहर के शानौशौकत को मुहं चिढ़ाता है। बस्ती की तंग गलियों में मुश्किल से दो आदमी एक साथ चल सकते है, लेकिन फिर भी यहां दिन भर आवाजाही रहती है। कारण कि यहां पर रहने वाले अधिकतर मजदूर वर्ग के लोग दिन भर किसी ने किसी काम में जुटे रहते हैं। कोई फैक्ट्री जा रहा है, तो कोई ठेला चलाने और कोई रात में आॅटो या रिक्शा खींचने का काम करता है। बस्ती की करीब 70 फीसदी आबादी रिक्शा चलाती है। जबकि, 30 प्रतिशत लोग माल उठाने और पहुंचाने का काम करते हैं। इसे वह पल्लेदारी करना कहते हैं। करीब दो सौ मीटर लंबी और 50 मीटर चैड़ी जगह पर करीब 500 परिवार रहते हैं, जिनकी कुल आबादी पांच हजार से भी उपर है। यह अलग बात है कि इसमें से अधिकतर अस्थायी निवासी है, जो आते जाते रहते हैं। लेकिन, बस्ती में रहने वाले बडे़ बुजुर्ग यह बताते हैं कि यहां हमेशा पांच हजार की आबादी का आंकड़ा बना रहता है। क्योंकि, जितने लोग यहां से चले जाते हैं, उतने ही नौजवान आ जाते हैं। गांवों में बेरोजगारी इतनी है कि यह सिलसिला हमेशा चलता रहता है।

इस बस्ती में आबादी को जीने के लिए सभी जरूरी चीजें गायब हैं। न साफ हवा, न पानी और न मलमूत्र त्यागने की जगह। बस्ती में सड़क नहीं बनी है। बस खुली नाली और उसके बीच में चलने की छोटी-छोटी जगह है। बस्ती के पास एक सरकारी स्कूल है, जहां बच्चे पढ़ने जाते हैं, लेकिन गरीबों में भी अत्यधिक गरीब होने के कारण स्कूल में भी उनके साथ भेदभाव होता है। गंदगी और अत्यधिक प्रदूषण में जिंदगी जीने वाले एक भारी आबादी के लिए नजदीक में कोई स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। उन्हें दिल्ली के सरकारी अस्पताल के ही भरोसे रहना पड़ता है, जहां गरीबों के साथ भेदभाव आम बात है। बस्ती में कोई सीवर लाइन नहीं है। इसलिए, शौचालय भी नहीं हैं। खाली मैदान सिमटने के कारण घरों में शौचालय बनाए गए, जिसका मल – मूत्र व गंदा पानी खुली नालियों में बहाया जाने लगा।

स्लम बस्तियों में रहने वाले दूसरे प्रदेशों के निवासी हैं, जो खेती किसानी छोड़कर या बेहतर जिंदगी की तलाश में बड़े शहर की ओर रूख करते हैं। कम शैक्षणिक स्थिति या अनपढ़ या स्पेशल स्किल्ड की कमी के कारण उन्हें मजदूरी या छोटे मोटे कामों पर निर्भर रहना पड़ता है। जानकारी के अभाव में कार्यकुशलता बढ़ाने की सरकारी योजनाएं भी यहां काम नहीं आती हैं। अत्यधिक गंदगी व जल निकासी के अभाव के कारण यहां रोगों का बोलबाला रहता है। नजदीक के स्वास्थ्य केंद्रों पर ही निर्भय रहने वाले स्लमवासी को आय का एक बड़ा हिस्सा दवा इलाज पर ही खर्च हो जाता है। दुर्भाग्य यह है कि स्लम एरिया को साफ रखने और एक बेहतर जिंदगी की तलाश में आए लोगों को सचमुच की बेहतर जिंदगी देने की कोई व्यवस्था सरकारी सिस्टम के पास नहीं है।  

असल में, शहरी क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं अधिक होती हैं, इसलिये वहां ज्यादा लोग रोजगार की तलाश में गांवों या छोटे शहरों से पलायन करके आते हैं। यहां आकर वह ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक धन कमाते हैं और राष्ट्रीय आय में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। लेकिन, असमान विकास के कारण उन्हें उपेक्षित होना पड़ता है। वह नारकीय जिंदगी जीने को मजबूर रहते हैं। 

सरकार ने गरीबों के लिए खासतौर से शहरी गरीबों के लिए आवास योजना, अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन (अमृत), स्मार्ट सिटी मिशन, डिजिटल इंडिया, जन धन योजना और मेक इन इंडिया आदि दर्जनों योजनाओं की शुरूआत की है। स्थानीय जिला प्रशासन की इकाईयां भी कई तरह की योजनाओं को संचालित करती हैं, जिससे शहरी गरीबों खासतौर पर स्लम में रहने वाले गरीबों को बुनियादी सार्वजनिक सेवाएं, जैसे पानी, साफ-सफाई, स्वास्थ्य और शिक्षा आदि उपलब्ध हो सके। लेकिन, सरकारी योजनाओं की चाल झुग्गी झोपड़ियों में नारकीय जीवन जीने वालों के विकास के मामले में कुछ ज्यादा ही सुस्त है।

आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 1983 में शहरी क्षेत्रों में प्रवासियों का अनुपात 31.6 प्रतिशत था। 2007-08 में, यह बढ़कर 35.4 प्रतिशत हो गया। वहीं, 2001 की जनगणना में शहर – कस्बों की कुल संख्या 5,161 थी, जो 2011 में बढ़ कर 7,936 हो गई। यानी शहरों का विस्तार तेजी से हो रहा है और मलिन बस्ती या स्लम एरिया में रहने वालों की संख्या भी बढ़ रही है।

भारत का छोटा-बड़ा शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहां मलिन बस्ती न हो। आज हर तीन भारतीयों में से एक शहरों और कस्बों में रहने लगा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में विश्व की आधी आबादी शहरों में रहने लगी है और 2050 तक भारत की आधी आबादी महानगरों और शहरों में रहने लगेगी। यूएन का अनुमान है कि 1990 और 2025 के बीच विकासशील देशों में शहरी आबादी में तीन गुना वृद्धि हो चुकी होगी और यह कुल जनसंख्या के 61 प्रतिशत के बराबर हो जाएगी।

मौजूदा दौर में देश के सभी बड़े शहरों और महानगरों में बड़ी संख्या में स्लम बस्तियां बन गई हैं। आज देश में लगभग 7 करोड़ लोग शहरी झुग्गी-बस्तियों में रहते हैं, जहां न तो साफ पानी है, न सफाई और न अन्य मूलभूत सुविधाएं। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग पुलों के नीचे, सड़कों पर और जहां-तहां जीवनयापन को मजबूर हैं। इनमें रहने वाले लोग शहरी जनसंख्या से संबंधित उच्च एवं मध्य वर्ग की अनेक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, परंतु वे न केवल गरीबी के शिकार हैं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित हैं। सड़कों पर गड्ढ़े, सीवर प्रणाली का अभाव एवं जल-जमाव से होने वाली परेशानियां और बीमारियां, बिजली, पानी एवं संचार सुविधाओं का अस्त-व्यस्त व असमान रूप, मलिन बस्तियों को इतना अधिक समस्यामूलक बना देता है कि सरकारी अधिकारी भी यहां जाने से हिसकिचाते हैं।

विगत सालों में एक अन्य नयी समस्या जो गरीबों के सामने आने लगी है। वह है शहरों की तकनीक पर बढ़ती निर्भरता। शहर या स्मार्ट-सिटी में पैर पसारती उन्नत तकनीक के सामने गांव से भारी मात्रा में आये निम्न-कौशल वाले कारीगरों के लिए औपचारिक उद्योगों या आधुनिक सेवाओं में कोई जगह नहीं है। इसलिए ये बेगारी करने के लिए मजबूर हैं। सुदूर गांव के बेहतरीन हस्तशिल्प के कारीगर शहरों में रिक्शा चलाने को बाध्य हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुमान है कि भविष्य में अधिकांश जनसंख्या वृद्धि शहरी क्षेत्रों में ही होगी। 2030 तक, 16.5 करोड़ अतिरिक्त लोग शहरी क्षेत्रों की ओर रूख करेंगे। आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के नेशनल रिपोर्ट (इंडिया हैबिटेट) के अनुसार, 2011 तक शहरी आबादी का 17 प्रतिशत झुग्गी झोपड़ियों और स्लम्स में रहता था, जो बढ़ रहा है। आश्चर्यजनक रूप से झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले परिवारों की कुल संख्या 2001 में 1 करोड़ से बढ़ कर 2011 में 1.5 करोड़ हो गई। अधिकांश शहरी गरीब मेगा शहरों में रहते हैं। इसमें ग्रेटर मुंबई, दिल्ली – एनसीआर और कोलकाता की झुग्गी – झोपड़ियां शामिल हैं। लेकिन, विगत दशकों से अपेक्षाकृत छोटे शहरों में भी स्लम्स की संख्या बढ़ती जा रही है, जिनके विकास को लेकर सरकार के पास कोई ठोस उपाय नहीं है।

-प्रदीप श्रीवास्तव

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