सीवर में दम घुटने से 5 मज़दूरों की मौत

कब तक मरते रहेंगे मज़दूर?

गुरुवार 22 अगस्त को ग़ाज़ियाबाद के नंदग्राम के कृष्ण कुंज इलाक़े में हुए हादसे में पांच मज़दूरों की एक नई सीवर लाइन में घुटकर दर्दनाक मौत हो गई।विजय राय, शिवकुमार राय, दामोदर, होरिल साद, संजीत साद ये वो पांच नाम हैं जो सीवर के अंधेरे में हमेशा के लिए खो गए। वे श्रमिक जल निगम के लिए काम करने वाली एक कंपनी ईएमएस इन्फ़्राकॉन के तहत काम करते थे।


निर्माण कार्य मे लगे थे, उतार दिया सीवर में

ये मज़दूर एक नई सीवर लाइन से नाली को जोड़ने और उसमें मसाला लगाने का काम कर रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़, उन्होंने बाहर से मसाला लगा दिया था लेकिन जब एक आदमी मसाला लगाने के अंदर सीवर में झुका तो उसे गैस चढ़ी और वो अंदर गिर गया।
उसे बचाने के लिए दूसरा, फिर पहले और दूसरे को बचाने की कोशिश में तीसरा मज़दूर गिर गया। बचाने की इस कोशिश में मेनहोल में पांच मज़दूर समा गए।
ख़बर सुनकर अगली साइट से मज़दूर मास्क और रस्सी लेकर दौड़े आए लेकिन देर हो चुकी थी। सूचना के बावजूद ना तो समय से पुलिस पहुँची, ना ही एम्बुलेंस। बाइक और स्कूटी की मदद से उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।

सभी मज़दूर बिहार के समस्तीपुर के

ये सभी मज़दूर बिहार से आकर यहाँ काम कर रहे थे। इनका परिवार हज़ारों किलोमीटर दूर बिहार के समस्तीपुर में रहता है, इसलिए दुर्घटना के डेढ़ दिन बाद भी ग़ाज़ियाबाद के पोस्टमार्टम हाउस के बाहर सिर्फ़ दो मज़दूरों के रिश्तेदार पहुंच पाए थे।

पुलिस में दो मामले दर्ज

पुलिस ने इस मामले में दो मामले दर्ज किए हैं और जल निगम के लिए काम करने वाली एक कंपनी ईएमएस इन्फ़्राकॉन के तीन लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा पंजीकृत हो गया।

अंततः मामले की जाँच होगी, तबतक कोई और दुर्घटना घटित होगी, कुछ और मज़दूर मरेंगे, फिर जांच होगी और कुल मिलाकर ढाक के तीन पात! मरेगा तो मज़दूर ही!

कहीं नही होता इस क़ानूनी प्रावधान का पालन

18 सितंबर 2013 को अमल में लाए गए मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में उतारना पूरी तरह से ग़ैर-क़ानूनी है।

अगर किसी व्यक्ति को सीवर में भेजकर सफ़ाई करवाना मजबूरी है तो इसके कई नियमों का पालन करना होता है।सबसे पहले तो सीवर में उतरने के लिए इंजीनियर की अनुमति लेने होती है और मज़दूर को सफ़ाई के दौरान ज़रूरी ख़ास सूट, ऑक्सीजन सिलेंडर, मास्क, गम शूज़, सेफ़्टी बेल्ट मुहैया करना होता है। सीवर के पास एंबुलेंस भी खड़ी होनी चाहिए।

स्थिति यह है कि कहीं भी इसका अनुपालन नहीं होता है, सरकारी क्षेत्र में भी नहीं। यह घटना तो सरकारी क्षेत्र के जल निगम का है। यही नहीं, इसके लिए दोषी भी विभाग नहीं, ठेकेदार होगा, और यदि किसी की सजा की नौबत भी आई तो ठेकेदार का कोई निचला कर्मचारी की होक इतिश्री हो जाएगा।

सीवर में मौतों से किसी की नही हुई है सजा

आंकड़े बताते हैं कि हर पांच दिन में एक मजदूर की जान सीवर सफाई के दौरान चली जाती है। कई बार ऐसा हुआ है कि एक मजदूर पहले जहरीली गैस की चपेट में आता है, फिर उसे बचाने में दूसरों की भी जान चली जाती है।

हाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीवर में मौतों के मामले में एक भी व्यक्ति को सज़ा नहीं हुई है।

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