आगस्त क्रांति का वह तूफ़ान जिसने ठोंका अंग्रेजी हुक़ूमत के ताबूत में अंतिम कील

9 अगस्त, सन् 1942 में एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिसने अंग्रेज हुक्मरानों की चूलें हिला दीं। इसीलिए 9 अगस्त के दिन को इतिहास में अगस्त क्रांति दिवस के रूप में जाना जाता है। आंदोलन मुम्बई के जिस पार्क से शुरू हुआ वह अगस्त क्रांति मैदान बन गया।

पूरे देश मे फैल गया था आंदोलन इस आंदोलन की ताप पूरे देश में फैल गई।

अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होते हुए बलिया के बागियों ने 19 अगस्त, 1942 को बलिया में अपनी सरकार स्थापित कर ली थी। लाचार हुकूमत जेल में बंद चित्तू पांडे व उनके सहयोगियों को रिहा करने के लिए मजबूर हुई थी और बलिया आजाद घोषित हो गया था।

8 अगस्त की रात ही पटना में सैंकड़ों गिरफ्तार हुए, लेकिन आंदोलन और तेज हो गया। संघर्षशील जनता ने 48 घंटे बाद फिरंगी राज के प्रमुख प्रतीक (पुराना सचिवालय) पर तिरंगा लहरा दिया। सरकारी दफ्तर-थाने से अंग्रेज या उनके चमचे मार भगाए गए। मुज़फ्फरपुर की जनता ने तो गोंलियों का मुकाबला लकड़ी की ढाल से किया। आरा, हाजीपुर, सीतामढ़ी व संथालपरगाना की जेल तोड़ कैदी आज़ाद हो गए। विद्रोह से डर कर मुंगेर, पुर्णिया, शाहाबाद, आरा, दरभंगा, चंपारण, भागलपुर… जिलों के 80 फीसद ग्रामीण थाने ज़िला मुख्यालयों मे आ गए। टाटा नगर में मजदूरों ने हड़ताल कर दी। चंपारण से हजारीबाग, भागलपुर तक आंदोलन तेज होता गया।

आंदोलन में लोहाघाट, अल्मोड़ा और बरेली सालम क्षेत्र के क्रांतिवीरों का योगदान स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। 25 अगस्त 1942 को अल्मोड़ा के जैंती के धामद्यो में ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेते हुए चौकुना गांव निवासी नर सिंह धानक और कांडे निवासी टीका सिंह कन्याल शहीद हो गए थे। यही हाल देश के अन्य हिस्सों में भी था।

आंदोलन की बागडोर जनता के हाथ में भारत छोड़ो आंदोलन उपनिवेशवाद से देश की मुक्ति के लिए एक निर्णायक मोड़ था। इस आंदोलन ने यह साबित किया कि आजादी हासिल करने की निर्णायक ताक़त जनता है।

इस आंदोलन की खासियत ये थी कि इसका नेत़ृत्व किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं था। अंग्रेज़ों को भगाने का देशवासियों में स्वतःस्फूर्त ऐसा जुनून पैदा हो गया कि कई जगहों पर बम विस्फोट हुए, सरकारी इमारतों को जला दिया गया, बिजली काट दी गई और परिवहन व संचार सेवाओं को भी ध्वस्त कर दिया गया। सरकारी आकलनों के अनुसार, एक सप्ताह के भीतर 250 रेलवे स्टेशन, 500 डाकघरों और 150 थानों पर हमले हुए और उन्हें क्षति पहुंचाया गया।

भयावह दमन का दौर आंदोलन जितना उग्र था, अंग्रेजों ने उसका दमन भी उतनी ही क्रूरता से किया। आंदोलन से बौखलाए अंग्रेज़ हुक्मरानों ने हजारों प्रदर्शनकारियों और निर्दोष लोगों को गोली से भून डाला, जेलों में ठूंस दिया। इतिहासकार विपिनचंद्र के अनुसार, 1942 के अंत तक 60,000 से ज्यादा लोंगों को हवालात में बंद कर दिया गया, जिनमें 16,000 लोगों को सजा दी गई। आंदोलन तात्कालिक रूप से कुचल दिया गया, लेकिन इसने बर्तानवी हुक्मरानों के ताबूत में अंतिम कील ठोंकने का काम किया। लेकिन जनांदोलन की ताक़त से 5 साल में ज़ालिमों को देश छोड़ कर भागना पड़ा।

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